डिजिटल डेस्क- बिहार की राजनीति की नर्सरी कहे जाने वाले पटना विश्वविद्यालय में 2026 के छात्रसंघ चुनाव ने इतिहास दोहरा दिया है। कांग्रेस के छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के उम्मीदवार शांतनु शेखर ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज कर 55 वर्षों बाद संगठन की वापसी कराई है। इस जीत को न केवल कैंपस की राजनीति, बल्कि बिहार कांग्रेस के लिए भी मनोबल बढ़ाने वाला माना जा रहा है। आखिरी बार 1971-72 में राम जतन सिन्हा NSUI के बैनर तले अध्यक्ष चुने गए थे। इसके बाद 1973 में लालू प्रसाद यादव ने समाजवादी खेमे से जीत हासिल कर कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती दी थी। 1970 का दशक पटना यूनिवर्सिटी छात्र राजनीति का स्वर्णिम और उथल-पुथल भरा दौर रहा। लालू प्रसाद यादव ने 1973-74 में अध्यक्ष रहते हुए जेपी आंदोलन में अहम भूमिका निभाई और यहीं से राज्य की राजनीति में समाजवादी धारा मजबूत हुई।
1984 के बाद से लगी थी चुनावों पर रोक
इसी दौर में आगे चलकर सुशील कुमार मोदी, रामविलास पासवान और शरद यादव जैसे नेताओं ने छात्र राजनीति से ही अपनी पहचान बनाई। हालांकि 1980 के दशक में बढ़ती हिंसा और शैक्षणिक सत्रों में देरी के चलते 1984 में छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगा दी गई। इसके बाद करीब 28 वर्षों तक कैंपस में लोकतांत्रिक प्रक्रिया ठप रही। 2012 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर छात्रसंघ चुनाव फिर से बहाल किए गए। नए दौर के पहले अध्यक्ष आशुतोष रंजन बने। हालांकि बीच-बीच में प्रशासनिक कारणों और कोरोना महामारी के चलते चुनाव प्रक्रिया प्रभावित होती रही।
कांग्रेस के लिए शुभ संकेत
ऐसे में 2026 का चुनाव कई मायनों में खास माना जा रहा है। शांतनु शेखर की जीत ने यह संकेत दिया है कि छात्र राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रीय दलों की सीधी भागीदारी और वैचारिक टकराव लौट रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम कैंपस में बदलते समीकरणों और युवाओं के नए राजनीतिक रुझान को दर्शाता है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, विधानसभा चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाने के बाद बिहार कांग्रेस के लिए यह जीत मनोबल बढ़ाने वाली साबित हो सकती है। छात्र राजनीति से निकले नेता ही अक्सर राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका निभाते हैं, ऐसे में पटना विश्वविद्यालय का यह परिणाम भविष्य की राजनीति के संकेत दे रहा है।