अरविंद केजरीवाल ने अपने जवाब में चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि उन्हें परेशान करने के बजाय हरियाणा के मुख्यमंत्री को दिल्ली के पानी को प्रदूषित करने से रोकने के लिए कोई आदेश पारित नहीं किया गया। उन्होंने कहा, “हैरान हूं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव से ठीक पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री को दिल्ली के पानी को प्रदूषित करने से रोकने के लिए कोई आदेश पारित नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने मुझे परेशान करना चुना।”
केजरीवाल ने आगे कहा कि अगर हरियाणा सरकार और भाजपा नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि चुनाव आयोग जनता के हित से ऊपर सत्तारूढ़ पार्टी के हित को रखता है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी एकमात्र चिंता दिल्ली के लोगों का स्वास्थ्य और सुरक्षा है, और वह लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा के लिए लड़ेंगे।
“अगर हम आवाज नहीं उठाते, तो दिल्ली को पानी नहीं मिलता”
केजरीवाल ने यह भी कहा कि दिल्ली में जो जहरीला पानी भेजा जा रहा था, उसे अब रोक दिया गया है। उन्होंने बताया कि दिल्ली में आने वाले पानी में अमोनिया की मात्रा 7 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) से घटकर अब 2 पीपीएम हो गई है। यह बदलाव उनके संघर्ष और आवाज उठाने का परिणाम बताया। केजरीवाल ने कहा, “अगर हम आवाज नहीं उठाते और संघर्ष नहीं करते, तो आज दिल्ली की आधी आबादी को पानी नहीं मिल रहा होता। हमने दिल्ली को बहुत बड़े पानी के संकट से बचा लिया।”
सियासी बयानबाजी और प्रदूषण का मुद्दा
केजरीवाल का यह बयान यमुना प्रदूषण को लेकर दिल्ली की सियासत में और गर्मी ला सकता है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा ने जहां केजरीवाल सरकार पर प्रदूषण नियंत्रण के लिए पर्याप्त कदम न उठाने का आरोप लगाया, वहीं कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए इसे राजनीति से ऊपर उठकर सुलझाने की जरूरत पर जोर दिया है।
इस बयान के बाद यह भी चर्चा तेज हो गई है कि प्रदूषण और पानी के संकट के मुद्दे को आगामी विधानसभा चुनाव में सियासी हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। अब देखना होगा कि इस मुद्दे पर चुनाव आयोग और सियासी दलों का क्या रुख होता है, और क्या यह मामला दिल्ली के आगामी विधानसभा चुनावों में एक अहम भूमिका निभाता है।
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