सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एम्स में पैलिएटिव केयर पर हरीश राणा, डॉक्टरों ने कहा- मौत का समय बताना संभव नहीं

KNEWS DESK- सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद 32 वर्षीय हरीश राणा को दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences (एम्स) में पैलिएटिव केयर विभाग के तहत रखा गया है। डॉक्टरों के अनुसार उनकी हालत को देखते हुए यह बताना फिलहाल संभव नहीं है कि उनकी मृत्यु में कितना समय लगेगा। यह मामला परोक्ष इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) से जुड़ा है, जिस पर देशभर में चर्चा हो रही है।

एम्स के पूर्व निदेशक Dr. M. C. Mishra ने बताया कि पैसिव यूथेनेशिया की स्थिति में मृत्यु की प्रक्रिया अलग-अलग मामलों में अलग समय ले सकती है। उन्होंने कहा कि हरीश राणा की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह अनुमान लगाना कठिन है कि इसमें कितने दिन या कितना समय लग सकता है।

डॉ. मिश्रा के अनुसार, यदि मरीज को दिए जाने वाले पोषण या भोजन की मात्रा कम की जाती है तो मृत्यु की प्रक्रिया अपेक्षाकृत तेजी से हो सकती है। हालांकि फिलहाल उनके इलाज में किसी नए चिकित्सा हस्तक्षेप की योजना नहीं है, क्योंकि यह मामला पैलिएटिव केयर के दायरे में रखा गया है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पैलिएटिव केयर में मुख्य रूप से मरीज को दर्द से राहत देने के लिए पेन मैनेजमेंट किया जाता है। हरीश राणा के मामले में डॉक्टरों का कहना है कि फिलहाल उन्हें किसी प्रकार का दर्द महसूस नहीं हो रहा है।

एम्स प्रशासन ने बताया कि मरीज की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और आवश्यक देखभाल जारी है। यह पूरी प्रक्रिया मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) की निगरानी में की जा रही है। बताया जा रहा है कि यह भारत का पहला ऐसा मामला है जिसमें Supreme Court of India ने किसी व्यक्ति को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है।

हरीश राणा वर्ष 2013 में Chandigarh में एक हादसे के दौरान चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस दुर्घटना के बाद से वह स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में हैं। पिछले 13 वर्षों से वे अचेत अवस्था में बिस्तर पर हैं और जीवन रक्षक प्रणाली पर निर्भर रहे हैं।

उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति मांगी थी, जिसे अदालत ने मंजूरी दे दी। इसके बाद उन्हें एम्स दिल्ली में पैलिएटिव केयर के तहत रखा गया है।

डॉक्टरों के अनुसार पैलिएटिव केयर ऐसी चिकित्सा सेवा है, जिसका उद्देश्य गंभीर या असाध्य बीमारी से जूझ रहे मरीज को आराम देना और उसकी जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाना होता है। इसमें बीमारी को पूरी तरह ठीक करने के बजाय मरीज के दर्द, सांस लेने में तकलीफ, घबराहट, बेचैनी और अन्य शारीरिक या मानसिक समस्याओं को कम करने पर ध्यान दिया जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की देखभाल उन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण होती है जिनकी बीमारी का पूर्ण इलाज संभव नहीं होता, लेकिन उन्हें सम्मानजनक और कम पीड़ा वाला जीवन प्रदान किया जा सकता है।