शिव शंकर सविता- देश में आगामी पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर सियासी तापमान तेज़ी से बढ़ता दिख रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के कड़े आरोपों और खुले ऐलान के बाद अब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाने यानी महाभियोग जैसी संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा शुरू हो गई है। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठाते हुए आशंका जताई है कि आने वाले चुनावों में मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया के ज़रिए धांधली की जा सकती है। उन्होंने कहा कि विपक्षी शासित राज्यों में चुनाव आयोग निष्पक्षता के बजाय “राजनीतिक दबाव” में काम करता दिखाई दे रहा है। ममता के इस बयान के बाद यह मामला सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया पर बहस तेज़ हो गई है।
ममता बनर्जी का बड़ा ऐलान
CEC के बयान के जवाब में ममता बनर्जी ने साफ कहा कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में गड़बड़ी, वोटर डेटा में हेरफेर और प्रशासनिक दबाव के ज़रिए चुनाव परिणाम प्रभावित किए जा सकते हैं। ममता ने यह भी संकेत दिया कि अगर चुनाव आयोग ने अपनी भूमिका में पारदर्शिता नहीं दिखाई, तो विपक्ष को संवैधानिक रास्ते अपनाने पर मजबूर होना पड़ेगा। इसी ऐलान के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को लेकर चर्चाएं तेज़ हो गईं।
क्या CEC को हटाने का प्रस्ताव ला सकता है विपक्ष?
अब सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल मिलकर मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का प्रस्ताव ला सकते हैं। हालांकि अभी तक किसी पार्टी ने इसकी औपचारिक घोषणा नहीं की है। कांग्रेस सांसद सैयद नासिर हुसैन ने कहा कि पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर फिलहाल कोई औपचारिक चर्चा नहीं हुई है, लेकिन अगर हालात ऐसे बने कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हों, तो संविधान के तहत सभी विकल्प खुले हैं। अगर ऐसा प्रस्ताव आता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की बेहद दुर्लभ घटनाओं में से एक होगी, क्योंकि आज़ादी के बाद से अब तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को इस प्रक्रिया के ज़रिए हटाया नहीं गया है।
क्यों इतनी सख्त है CEC को हटाने की प्रक्रिया?
मुख्य चुनाव आयुक्त का पद एक संवैधानिक और स्वतंत्र पद है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 यह सुनिश्चित करता है कि चुनाव आयोग सरकार और राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करे। इसी वजह से CEC को हटाने की प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को हटाने जैसी कठिन और सख्त बनाया गया है। CEC को साधारण बहुमत के आधार पर नहीं हटाया जा सकता। इसके लिए संसद में विशेष बहुमत और लंबी जांच प्रक्रिया जरूरी होती है।
हटाने की प्रक्रिया कैसे शुरू होती है?
CEC को हटाने की प्रक्रिया संसद से शुरू होती है। उनके खिलाफ ‘दुर्व्यवहार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर प्रस्ताव लाया जा सकता है। यह प्रस्ताव लोकसभा या राज्यसभा, किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। लोकसभा में इसके लिए कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। इसे तकनीकी रूप से महाभियोग नहीं कहा जाता, बल्कि ‘हटाने की प्रक्रिया’ कहा जाता है। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा के सभापति आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करते हैं। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के एक जज करते हैं, जबकि एक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद इसके सदस्य होते हैं। समिति आरोपों की गहन जांच करती है और CEC को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर देती है।
‘विशेष बहुमत’ की शर्त
अगर समिति आरोपों को सही पाती है, तो प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना अनिवार्य होता है। यानी सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन। दोनों सदनों से पारित होने के बाद प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास जाता है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही CEC को पद से हटाया जा सकता है।
पहले भी हो चुकी है कोशिश
2006 में तत्कालीन CEC एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला के खिलाफ राष्ट्रपति को सिफारिश भेजी थी। इसके बाद उन्हें हटाने की कोशिश भी हुई, लेकिन तत्कालीन लोकसभा स्पीकर ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन वहां से भी कोई राहत नहीं मिली।