यूजीसी विवाद पर धर्मेंद्र प्रधान का भरोसा: उत्पीड़न की आड़ में कानून का गलत इस्तेमाल नहीं होगा

डिजिटल डेस्क- यूजीसी के नए रेगुलेशन को लेकर देशभर में जारी बहस अब कानूनी मोड़ पर पहुंच गई है। एक तरफ जहां विरोध के सुर तेज हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बड़ा बयान देते हुए आश्वासन दिया है कि नए नियमों के तहत किसी के साथ कोई भेदभाव या उत्पीड़न नहीं होने दिया जाएगा। मंत्री ने साफ कहा कि किसी भी कानून का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा और सभी वर्गों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे। धर्मेंद्र प्रधान का यह बयान ऐसे समय आया है, जब यूजीसी के नए नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यूजीसी की हालिया गाइडलाइंस गैर-समावेशी हैं और इनमें जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को सीमित कर दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन नियमों में जातिगत भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित कर दिया गया है, जिससे सामान्य वर्ग को संस्थागत सुरक्षा और शिकायत निवारण की प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है।

कुछ वर्गों द्वारा ही उत्पीड़न होना मान लेना गलत

याचिका में कहा गया है कि यह मान लेना गलत है कि केवल कुछ वर्गों को ही जाति के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। वास्तविकता यह है कि किसी भी जाति या समुदाय का व्यक्ति अपनी पहचान के कारण उत्पीड़न का शिकार हो सकता है। ऐसे में नियमों का दायरा सीमित करना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। कानूनी तौर पर भी इन नियमों पर सवाल उठाए गए हैं। याचिका के अनुसार, यूजीसी के ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिले बराबरी के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। साथ ही, अनुच्छेद 15(1), जो धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है, उसके भी विपरीत हैं। इसके अलावा, अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार को भी इन नियमों से ठेस पहुंचती है।

याचिका में की गई मांग- यूजीसी के नियम 3(सी) पर लगे रोक

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि यूजीसी के नियम 3(सी) को उसके मौजूदा स्वरूप में लागू करने पर रोक लगाई जाए। साथ ही जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को जाति-तटस्थ और संविधान के अनुरूप दोबारा परिभाषित करने का निर्देश दिया जाए, ताकि हर उस व्यक्ति को सुरक्षा मिल सके जो जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार होता है। इसके अलावा, याचिका में केंद्र सरकार और यूजीसी को निर्देश देने की मांग भी की गई है कि समान अवसर केंद्र और समानता हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएं बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए उपलब्ध कराई जाएं।

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