बांग्लादेश नेशनल पार्टी ने जुलाई चार्टर से बनाई दूरी, संवैधानिक सुधार परिषद की शपथ से किया इनकार

KNEWS DESK- बांग्लादेश की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है। सत्ता में आने के बाद बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) ने जुलाई चार्टर को मानने से इनकार कर दिया है। मंगलवार (17 फरवरी) को बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान समेत पार्टी के सांसदों ने संवैधानिक सुधार परिषद के सदस्य के रूप में शपथ लेने से इंकार कर दिया।

बीएनपी नेता सलाहुद्दीन अहमद ने स्पष्ट कहा कि उनकी पार्टी इस प्रक्रिया को स्वीकार नहीं करती। बीएनपी के इस रुख से जुलाई चार्टर का भविष्य अधर में लटकता नजर आ रहा है।

अंतरिम सरकार द्वारा पेश किए गए जुलाई चार्टर को लोकतांत्रिक सुधारों की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा था। इस प्रस्ताव पर जनमत संग्रह भी कराया गया था, जिसमें 50 प्रतिशत से अधिक नागरिकों ने समर्थन दिया था।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार से चार्टर को लागू करने की प्रक्रिया शुरू होनी थी। योजना के तहत सभी सांसदों को संवैधानिक सुधार परिषद के सदस्य के रूप में शपथ दिलाई जानी थी। हालांकि, जब बीएनपी सांसद मंच पर पहुंचे तो उन्होंने शपथ लेने से इनकार कर दिया।

बीएनपी के बाद जमात-ए-इस्लामी ने भी जुलाई चार्टर को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। पार्टी के नायब अमीर सैयद अब्दुल्ला मुहम्मद ताहेर ने कहा कि उनके सांसद भी परिषद की शपथ नहीं लेंगे और वे अपनी राजनीतिक रणनीति के अनुसार आगे बढ़ेंगे।

जमात-ए-इस्लामी को देश की प्रमुख विपक्षी ताकतों में गिना जाता है, ऐसे में उसका विरोध इस मुद्दे को और जटिल बना सकता है।

अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद हुए व्यापक विद्रोह के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता से विदाई हुई थी। इसके बाद अर्थशास्त्री मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन किया गया।

लोकतांत्रिक ढांचे में सुधार के उद्देश्य से यूनुस सरकार ने जुलाई चार्टर का प्रस्ताव रखा। इस चार्टर में कई अहम बदलावों का सुझाव दिया गया है।

जुलाई चार्टर के प्रमुख प्रस्ताव

प्रधानमंत्री की समय-सीमा– कोई भी व्यक्ति एक बार में 10 साल से अधिक प्रधानमंत्री नहीं रह सकेगा।

द्विसदनीय संसद– मौजूदा संसद के साथ 100 सीटों वाला एक उच्च सदन बनाने का प्रस्ताव, जो भारत की राज्यसभा की तर्ज पर होगा।

पदों का पृथक्करण– प्रधानमंत्री बनने वाला व्यक्ति अपनी पार्टी के अध्यक्ष पद पर नहीं रह सकेगा।

न्यायपालिका में सुधार– जजों की नियुक्ति के लिए अलग कॉलेजियम प्रणाली बनाने का प्रस्ताव, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होंगे।

महिला प्रतिनिधित्व– संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की सिफारिश।

विपक्ष की भूमिका– उपसभापति और संसदीय समितियों के प्रमुख विपक्ष से चुने जाने का प्रावधान।

चुनाव सुधार– निष्पक्ष केयरटेकर सरकार की वापसी और चुनाव प्रणाली में सुधार की सिफारिश।

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