शिव शंकर सविता- महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। बाबा विश्वनाथ और मां गौरा को केवल 24 घंटे के भीतर करीब छह लाख रुपये बतौर ‘चढ़ावा’ प्राप्त हुआ। मंदिर प्रशासन के अनुसार, कल तड़के सुबह 3 बजकर 30 मिनट से आज सुबह 4 बजे तक लगभग 500 श्रद्धालुओं ने यूपीआई के माध्यम से शगुन राशि अर्पित की। मंदिर की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, यूपीआई के जरिए सबसे कम 1 रुपया और सबसे अधिक 50,001 रुपये की राशि अर्पित की गई। औसतन प्रत्येक भक्त ने करीब 1,200 रुपये का शगुन दिया।
भक्तों ने डिजिटल माध्यम में भी दिखाई रूचि
इस बार की खास बात रही कि भक्तों ने डिजिटल माध्यम से बढ़ती भागीदारी को सुनिश्चित किया। फरवरी माह के आंकड़े भी इस भक्ति की गहराई को दर्शाते हैं। 14 फरवरी को 92 श्रद्धालुओं और 13 फरवरी को 65 श्रद्धालुओं ने यूपीआई से दान दिया। पूरे फरवरी महीने में अब तक करीब 1,200 भक्तों ने लगभग आठ लाख रुपये की राशि डिजिटल माध्यम से मंदिर को समर्पित की है।
ब्रह्म मुहूर्त की आरती के बाद से शुरू हुआ भक्तों का प्रवेश
महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित चार प्रहर की आरती आज सुबह विधिवत संपन्न हो गई। प्रथम प्रहर की आरती रात्रि 10 बजे से 12 बजकर 30 मिनट तक चली। इसे महानिशा काल की सबसे प्रमुख आरती माना जाता है। मान्यता है कि इसी पावन रात्रि में भगवान शिव का विवाह माता पार्वती से हुआ था। द्वितीय प्रहर की आरती रात्रि 1 बजकर 30 मिनट से 2 बजकर 30 मिनट तक संपन्न हुई। इस दौरान विशेष श्रृंगार और भव्य साज-सज्जा के साथ बाबा विश्वनाथ को प्रसन्न किया गया। विवाह वर्षगांठ के उत्सव के रूप में माता पार्वती और दोनों पुत्रों के साथ भूतनाथ की आराधना की गई। तृतीय प्रहर की आरती तड़के सुबह साढ़े तीन बजे से ब्रह्म मुहूर्त 4 बजकर 25 मिनट तक चली। इसे ब्रह्मांड की त्रिशक्ति द्वारा सम्पन्न मानी जाने वाली आरती कहा जाता है। इस दौरान विवाह उत्सव अपने समापन की ओर बढ़ता है और श्रद्धालु अत्यंत भाव-विभोर होकर भोलेनाथ की आराधना करते हैं।
माता गौरा से जुड़ी हुई है मान्यता
चतुर्थ प्रहर की आरती विवाह के बाद विदाई का प्रतीक मानी जाती है। इस आरती में निराकार ब्रह्म स्वरूप भगवान भूतनाथ की स्तुति की जाती है। मान्यता है कि विवाह के उपरांत भगवान शिव मां गौरा को विदा कर अपने साथ ले जाते हैं और इसी के साथ विवाहोत्सव संपन्न हो जाता है। महाशिवरात्रि पर काशी में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ और डिजिटल दान की बढ़ती प्रवृत्ति ने यह स्पष्ट कर दिया कि आस्था और तकनीक का संगम अब नई परंपरा गढ़ रहा है। मंदिर प्रशासन ने सभी श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त किया है।