ग्लोबल मार्केट में हलचल, युद्ध के बीच कच्चा तेल $115 के पार पहुंचा

K News Desktop- मध्य-पूर्व में जारी युद्ध और बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाजार को झकझोर कर रख दिया है। सप्लाई प्रभावित होने के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। अगर हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ रोजमर्रा की चीजें भी महंगी हो सकती हैं, जिसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।

दरअसल, मध्य-पूर्व में भड़के संघर्ष और ईरान के इर्द-गिर्द बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की नींव हिला दी है। कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ते हुए खतरनाक स्तर तक पहुंच रही हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें इस तरह बेकाबू होती हैं, तो दुनिया भर में महंगाई का नया दौर शुरू हो जाता है। पेट्रोल और डीजल महंगे होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है और इसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ता है।

इस संकट की सबसे बड़ी वजह होरमुज जलडमरूमध्य में पैदा हुआ तनाव माना जा रहा है। यह संकरा समुद्री मार्ग वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है। दुनिया में इस्तेमाल होने वाले कुल कच्चे तेल का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। लेकिन मौजूदा हालात में ईरान के आसपास बढ़े तनाव और संभावित हमलों के खतरे के कारण कई बड़ी टैंकर कंपनियां और जहाज मालिक इस मार्ग से अपने जहाज भेजने से बच रहे हैं।

जहाजों की आवाजाही कम होने का सीधा मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई घट रही है। जब सप्लाई चेन बाधित होती है, तो उपलब्धता कम होने के कारण कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं।

बाजार के आंकड़े भी इस संकट की गंभीरता को दर्शा रहे हैं। अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट कच्चे तेल की कीमतों में करीब 28 फीसदी का उछाल आया है और यह लगभग 116 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है। वहीं ब्रेंट क्रूड की कीमतों में भी करीब 26 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और यह करीब 117 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है। वायदा बाजार के इतिहास में साल 1983 के बाद से यह एक हफ्ते में दर्ज की गई सबसे बड़ी तेजी मानी जा रही है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर होरमुज मार्ग जल्द सामान्य नहीं हुआ, तो यह संकट और गहरा सकता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर दबाव बढ़ने की आशंका है।

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