डिजिटल डेस्क- भारतीय आयुर्वेद को वैश्विक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले आचार्य बालकृष्ण को एक और प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया है। उन्हें ‘विश्व आयुर्वेद रत्न’ पुरस्कार से अलंकृत किया गया, जो नेट ग्रीन फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘अर्थ अवार्ड एंड हाई इंपैक्ट सस्टेनेबिलिटी डायलॉग 2026’ के तहत प्रदान किया गया। यह भव्य समारोह यूनेस्को हाउस में आयोजित हुआ, जिसमें देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं ने भाग लिया। हालांकि आचार्य बालकृष्ण इस समारोह में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन उन्होंने इस सम्मान को पूरे भारतीय आयुर्वेद और उसकी हजारों वर्षों पुरानी परंपरा को समर्पित किया। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि यह सम्मान किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस महान भारतीय ज्ञान-परंपरा का है, जिसने “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के सिद्धांत के साथ पूरी मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया है।
मंजिंदर सिंह सिरसा और डॉ बेन्नो बोएर सहित कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियां रहीं मौजूद
कार्यक्रम में मंजिंदर सिंह सिरसा और डॉ बेन्नो बोएर सहित कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियां मौजूद रहीं। इस अवसर पर विशेषज्ञों ने आयुर्वेद और सतत विकास (Sustainability) के बीच गहरे संबंधों पर चर्चा की और इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां आज के पर्यावरणीय संकटों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। नेट ग्रीन फाउंडेशन, जो एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास के क्षेत्रों में कार्य कर रही है। यह संस्था ऐसे व्यक्तियों और संगठनों को सम्मानित करती है, जो प्रकृति और मानव के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। ‘अर्थ अवार्ड’ इसी पहल का हिस्सा है, जो वैश्विक स्तर पर सकारात्मक बदलाव लाने वाले प्रयासों को पहचान देता है।
पतंजलि के माध्यम से जनमानस तक औषधियों को पहुंचाया
आचार्य बालकृष्ण का योगदान केवल आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार तक सीमित नहीं है। उन्होंने आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आयुर्वेद को जोड़कर इसे विश्व पटल पर स्थापित करने का कार्य किया है। पतंजलि आयुर्वेद के माध्यम से उन्होंने आयुर्वेदिक उत्पादों को आम जनमानस तक पहुंचाया और साथ ही औषधीय पौधों के संरक्षण, अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण पहल की। उनके प्रयासों से आज आयुर्वेद केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विश्वभर में एक वैकल्पिक चिकित्सा प्रणाली के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान की सराहना है, बल्कि भारतीय परंपरा और ज्ञान की वैश्विक स्वीकार्यता का भी प्रतीक है।