धनतेरस पर माता लक्ष्मी, भगवान कुबेर और भगवान धन्वंतरि की पूजा के साथ यमराज के नाम से दीपदान करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि शाम के समय घर के बाहर यम दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। लेकिन आखिर यह दीपक घर के अंदर नहीं, बल्कि बाहर ही क्यों जलाया जाता है और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी है? आइए जानते हैं।
KNEWS DESK- धनतेरस यानी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को हिंदू धर्म में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन लोग सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के साथ भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा करते हैं। इसके अलावा शाम के समय यमराज के नाम से दीपक जलाने की परंपरा भी निभाई जाती है।
इसे यम दीपदान या यम दीपक कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, धनतेरस की शाम यमराज के नाम से दीपक जलाने से परिवार के सदस्यों पर अकाल मृत्यु का संकट टलता है और लंबी आयु की कामना पूरी होती है। यही वजह है कि धनतेरस की पूजा में यम दीपक का विशेष महत्व माना गया है।
यम दीपक से जुड़ी क्या है पौराणिक कथा?
धनतेरस पर यम दीपक जलाने के पीछे एक प्रचलित पौराणिक कथा बताई जाती है। इस कथा का संबंध एक राजा और उसके पुत्र से है। कहा जाता है कि एक राजा के घर पुत्र का जन्म हुआ। जब राजकुमार की कुंडली दिखाई गई तो ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि विवाह के चौथे दिन सर्पदंश के कारण उसकी मृत्यु हो जाएगी। यह सुनकर राजा और रानी काफी चिंतित हो गए। उन्होंने अपने पुत्र को इस संकट से बचाने के लिए कई उपाय किए। राजकुमार की सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किए गए और उसे महिलाओं से दूर रखने का निर्णय लिया गया। लेकिन समय के साथ राजकुमार बड़ा हुआ और उसका विवाह हो गया। विवाह के बाद वह रात आई, जिस दिन उसकी मृत्यु की भविष्यवाणी की गई थी। राजकुमार की पत्नी को जब इस अनहोनी का पता चला तो उसने अपने पति की जान बचाने के लिए एक उपाय सोचा।
पत्नी ने ऐसे बचाई पति की जान
कथा के अनुसार, राजकुमार की पत्नी ने उस रात अपने पति को सोने नहीं दिया। उसने महल के मुख्य द्वार पर सोने-चांदी के आभूषण और धन का ढेर लगा दिया। इसके साथ ही पूरे महल में कई दीपक जलाकर रोशनी कर दी। इसके बाद वह पूरी रात अपने पति को कहानियां सुनाती रही और गीत गाकर उसे जगाए रखा। मान्यता है कि उसी रात यमराज सर्प का रूप धारण करके राजकुमार के प्राण लेने पहुंचे। जब यमराज महल के मुख्य द्वार तक पहुंचे तो वहां रखे सोने-चांदी के आभूषणों और दीपकों की तेज रोशनी से उनकी नजरें चौंधिया गईं। वह राजकुमार के कमरे तक नहीं पहुंच सके। पूरी रात गीत-संगीत सुनने के बाद सुबह होने पर यमराज को वहां से लौटना पड़ा। इस तरह राजकुमार की जान बच गई और उसकी पत्नी का सुहाग सुरक्षित रहा। इसी कथा से जुड़ी मान्यता के आधार पर धनतेरस की शाम यमराज के नाम से दीपक जलाने की परंपरा प्रचलित होने की बात कही जाती है।
घर के बाहर ही क्यों जलाया जाता है यम दीपक?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यमराज को दक्षिण दिशा का स्वामी माना जाता है। इसी कारण धनतेरस की शाम यमराज के नाम से जलाया जाने वाला दीपक घर के अंदर रखने के बजाय मुख्य द्वार के बाहर रखने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार दीपक को दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जलाने से यमराज की कृपा प्राप्त होती है और परिवार के सदस्यों पर अकाल मृत्यु का संकट टलता है। इसे परिवार की लंबी आयु और स्वास्थ्य की कामना से भी जोड़ा जाता है।
स्कंद पुराण में भी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर शाम के समय घर के बाहर यमराज के नाम से दीपक जलाने का उल्लेख मिलता है। इसी धार्मिक परंपरा के तहत धनतेरस की शाम लोग घर के मुख्य द्वार के बाहर यम दीपक जलाते हैं और परिवार की सुरक्षा तथा दीर्घायु की कामना करते हैं।