नाना पाटेकर की संवाद अदायगी का अंदाज सबसे अलग था। उनके डायलॉग में सिर्फ गुस्सा नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ बेचैनी, आम आदमी को जगाने की पुकार और बदलाव की हुंकार सुनाई देती थी।
Knews Desk – नाना पाटेकर सिर्फ अपनी दमदार अदाकारी के लिए नहीं, बल्कि अपनी खास संवाद अदायगी के लिए भी हमेशा याद किए जाएंगे। वह पर्दे पर जब कोई डायलॉग बोलते थे तो ऐसा लगता था जैसे किरदार के भीतर जमा गुस्सा और बेचैनी शब्दों के जरिए बाहर निकल रही हो। उनकी आवाज में ऐसी खदबदाहट होती थी कि सामने बैठा दर्शक भी उस बेचैनी का हिस्सा बन जाता था।
नब्बे के दशक में जब अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन वाले दौर के बाद सिनेमा में व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले किरदारों का एक नया दौर दिखाई दे रहा था, तब नाना पाटेकर ने अपनी अलग पहचान बनाई। उनके किरदार हथियार उठाकर सिस्टम से नहीं लड़ते थे, बल्कि अपने शब्दों से लोगों के भीतर सोई हुई ताकत को जगाते थे।
‘क्रांतिवीर’ का प्रताप नारायण तिलक
साल 1994 में रिलीज हुई मेहुल कुमार की ‘क्रांतिवीर’ में नाना पाटेकर ने प्रताप नारायण तिलक का किरदार निभाया था। यह किरदार उनकी पहचान का हिस्सा बन गया। फिल्म के संवादों ने नाना की संवाद अदायगी को अलग मुकाम दिया।
फिल्म के एक सीन में जब विधवा कलमवाली बाई को गुंडे पकड़ लेते हैं और उसका बेटा नाना के किरदार से अपनी मां को बचाने की गुहार लगाता है, तो प्रताप नारायण तिलक पहले हंसता है और फिर उसे खुद लड़ने की ताकत देता है। वह लोगों की बेबसी पर सवाल उठाते हुए उन्हें अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए प्रेरित करता है।
इस सीन का संदेश यही था कि किसी और के आने और बचाने का इंतजार करने के बजाय इंसान को अपने भीतर लड़ने की हिम्मत पैदा करनी चाहिए। डायलॉग खत्म होने के बाद कलमवाली बाई में जैसे नई ताकत आ जाती है।
‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने…’
‘क्रांतिवीर’ का सबसे चर्चित सीन फांसी से पहले का है। जब प्रताप नारायण तिलक को फांसी के फंदे तक ले जाया जाता है, तो वह भीड़ की तरफ देखकर हंसता है और फिर ऐसा मोनोलॉग बोलता है, जिसने हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार संवादों में जगह बनाई।
‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने…’ से शुरू होने वाला यह संवाद लोगों की खामोशी, डर और गुलामी की मानसिकता पर सीधा सवाल उठाता है। किरदार राजा-महाराजाओं से लेकर अंग्रेजों और फिर देश के गद्दार नेताओं और गुंडों की गुलामी तक का जिक्र करता है।
इसके बाद वह धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा और सांप्रदायिक तनाव पर भी सवाल उठाता है। इंसान को सबसे खूबसूरत रचना बताने के बाद वह समाज की हालत पर कटाक्ष करता है और चेतावनी देता है कि आज की खामोशी आने वाली पीढ़ियों के लिए रोने की वजह बन सकती है।
फिल्म का यह मोनोलॉग केके सिंह ने लिखा था, जबकि फांसी वाले सीन में नाना पाटेकर की प्रस्तुति ने इसे यादगार बना दिया।
‘यशवंत’ में सिस्टम पर सीधा वार
नाना पाटेकर की फिल्म ‘यशवंत’ भी उनके तीखे संवादों के लिए याद की जाती है। फिल्म में उनका किरदार उस आम आदमी की बेबसी और समझौते वाली जिंदगी पर सवाल उठाता है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में व्यवस्था के सामने झुकता चला जाता है।
फिल्म का चर्चित संवाद ‘एक मच्छर इंसान को हिजड़ा बना देता है…’ सिर्फ एक लाइन नहीं था। इसके जरिए किरदार यह बताने की कोशिश करता है कि छोटी सी परेशानी भी इंसान की पूरी रात छीन सकती है और धीरे-धीरे वह समझौतों का आदी होता चला जाता है।
डायलॉग आगे बढ़ते हुए उस जिंदगी पर कटाक्ष करता है, जिसमें इंसान सुबह भीड़ का हिस्सा बनता है, शाम को शराब पीता है, परिवार बनाता है और अगले दिन फिर वही जिंदगी दोहराता है। इसमें उसके भीतर के इंसान और आत्मा के मर जाने की बात कही जाती है।
नाना के डायलॉग में गुस्से से ज्यादा बेचैनी थी
नाना पाटेकर की खासियत यह थी कि उनके संवाद सिर्फ गुस्सा पैदा नहीं करते थे। उनके किरदारों में व्यवस्था को बदलने की बेचैनी दिखाई देती थी। वह खुद हथियार उठाने वाले नायक कम और दूसरे लोगों के हाथ में हिम्मत देने वाले किरदार ज्यादा नजर आते थे।
राजकुमार की संवाद अदायगी में रौब और अमिताभ बच्चन की आवाज में व्यवस्था के खिलाफ गुस्से की जो धार दिखाई देती थी, नाना पाटेकर की शैली उससे अलग थी। वह संवाद बोलते हुए ऐसे लगते थे जैसे खुद अपने भीतर से जूझ रहे हों।
इसी वजह से ‘क्रांतिवीर’, ‘यशवंत’ और उनकी कई दूसरी फिल्मों के संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं। नाना पाटेकर के निधन की खबर के बाद उनके निभाए किरदार और उनके डायलॉग एक बार फिर सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं।
नाना पाटेकर 8 अक्टूबर को 75 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए। उनके अचानक निधन की खबर से उनके प्रशंसक और फिल्म इंडस्ट्री सदमे में हैं। अभिनय के साथ-साथ उनकी आवाज और संवाद अदायगी भी उनकी ऐसी विरासत है, जिसे हिंदी सिनेमा लंबे समय तक याद रखेगा।