तीन बार CM रहे हरीश रावत अब कांग्रेस से क्यों हुए ‘बागी’? 78 की उम्र में अकेले यात्रा पर निकले

knews desk – उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के भीतर सियासी खींचतान तेज होती दिख रही है। पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर पार्टी नेतृत्व ने आपत्ति जताई है। कांग्रेस की उत्तराखंड प्रभारी कुमारी सैलजा ने 1 अक्टूबर को रावत को पत्र लिखकर यात्रा और उनके अन्य व्यक्तिगत कार्यक्रमों को आगे नहीं बढ़ाने का आग्रह किया था। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि चुनाव से कुछ महीने पहले संगठन से अलग कोई समानांतर कार्यक्रम पार्टी के हित में नहीं है।

हालांकि, हरीश रावत ने यात्रा रोकने के संकेत नहीं दिए। 5 अक्टूबर को उन्होंने जसपुर से हल्द्वानी तक यात्रा जारी रखने का ऐलान किया। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा कि चुनौती बड़ी है, लेकिन उत्तराखंड के स्वाभिमान के लिए उनका संकल्प भी मजबूत है और अब रुकना नहीं है।

सैलजा ने क्यों जताई आपत्ति?

कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा ने अपने पत्र में कहा कि रावत की यात्रा के बारे में न तो उनसे और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष से चर्चा की गई। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और ऐसे समय में पार्टी को एकजुट होकर काम करने की जरूरत है। ऐसे में समानांतर कार्यक्रम पार्टी के लिए उचित नहीं होगा।

कांग्रेस नेतृत्व की चिंता केवल यात्रा तक सीमित नहीं है। पार्टी चाहती है कि राज्य में वरिष्ठ नेताओं के कार्यक्रम संगठन के साथ तालमेल से हों, ताकि चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं और जनता के बीच एकजुटता का संदेश जाए। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, रावत की स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधियों ने उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर उनके भविष्य के राजनीतिक रोल को लेकर चर्चा तेज कर दी है।

रावत क्यों नहीं रोक रहे यात्रा?

हरीश रावत का उत्तराखंड की राजनीति में लंबा और प्रभावशाली राजनीतिक सफर रहा है। हाल में स्वास्थ्य लाभ के बाद उनकी सक्रियता फिर बढ़ी है। उन्होंने अपनी यात्रा को जनता से सीधे संवाद और उनका आभार जताने की पहल बताया है।

यात्रा के दौरान रावत लगातार कार्यकर्ताओं और आम लोगों से संपर्क कर रहे हैं। 5 अक्टूबर को जसपुर से शुरू हुआ कार्यक्रम काशीपुर, रामनगर और कालाढूंगी होते हुए हल्द्वानी तक पहुंचने वाला था।

ऐसे में उनकी सक्रियता को केवल पार्टी से टकराव के तौर पर देखना पूरी तरह सही नहीं होगा। यह भी संभव है कि रावत चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक सक्रियता और जनाधार को सामने रखना चाहते हों। हालांकि, उनके इस कदम से पार्टी के भीतर उनके राजनीतिक रोल और चुनावी रणनीति को लेकर बहस जरूर तेज हो गई है।

क्या इसे बगावत माना जाए?

फिलहाल हरीश रावत के कांग्रेस छोड़ने या अलग पार्टी बनाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए उनकी यात्रा को सीधे पार्टी से बगावत कहना जल्दबाजी होगी। मौजूदा विवाद मुख्य रूप से पार्टी संगठन और रावत की व्यक्तिगत राजनीतिक गतिविधियों के बीच तालमेल को लेकर है।

कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि एक तरफ संगठनात्मक अनुशासन और एकजुटता बनाए रखी जाए, वहीं दूसरी तरफ हरीश रावत जैसे वरिष्ठ नेता की राजनीतिक भूमिका को भी नजरअंदाज न किया जाए।

उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि आने वाले महीनों में कांग्रेस को उम्मीदवार चयन, संगठन और चुनावी नेतृत्व जैसे बड़े फैसले लेने हैं। ऐसे में हरीश रावत और पार्टी हाईकमान के बीच यह खींचतान आगे किस दिशा में जाती है, इस पर सबकी नजर रहेगी।

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