हार्ट अटैक से हुई मौत को केवल नेचुरल डेथ मानकर दहेज हत्या और क्रूरता से जुड़े मामले को शुरुआती स्तर पर खत्म नहीं किया जा सकता। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि अगर शादी के सात साल के भीतर महिला की मौत हुई है और उससे पहले दहेज के लिए प्रताड़ना के आरोप हैं, तो मौत की परिस्थितियों की पूरी जांच जरूरी है।
Knews Desk -इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दहेज हत्या के आरोप में दर्ज एक मामले को रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि किसी महिला की मौत हार्ट अटैक से होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मौत पूरी तरह प्राकृतिक थी। कोर्ट ने कहा कि अगर महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित किए जाने के आरोप लगाए गए हैं, तो इन आरोपों की जांच ट्रायल के दौरान सबूतों के आधार पर की जानी चाहिए।
मामला एक सास की याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता निर्मला देवी ने दहेज हत्या और क्रूरता से जुड़े मामले में दाखिल चार्जशीट, संज्ञान और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
मृतका की शादी निर्मला देवी के बेटे से 4 मई 2021 को हुई थी। 18 फरवरी 2025 को वह अपने ससुराल में बेहोशी की हालत में मिली थी। उसे पहले फिरोजाबाद के अस्पताल ले जाया गया और बाद में आगरा के अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान 25 फरवरी 2025 को उसकी मौत हो गई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह मायोकार्डियल इन्फार्क्शन यानी हार्ट अटैक से हुआ शॉक बताया गया था। हालांकि, जांच के दौरान मृतका के दोनों कंधों पर चोट और खरोंच के निशान भी मिले थे।
सास की ओर से दलील दी गई कि मृतका को पहले बुखार, कंपकंपी और सिरदर्द की शिकायत थी। इसके बाद उल्टी, होश में बदलाव और मुंह से झाग आने के बाद उसकी हालत बिगड़ गई। वायरल एन्सेफलाइटिस की आशंका में उसका इलाज किया गया और बाद में उसे कार्डियक अरेस्ट हुआ। याचिकाकर्ता का कहना था कि मौत मेडिकल जटिलताओं के कारण हुई और इसे चोट, जहर या किसी अन्य अप्राकृतिक कारण से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं है।
वहीं, अभियोजन पक्ष की ओर से मृतका के पति और ससुराल वालों पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने के आरोप लगाए गए। हाई कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के बयानों में सास के खिलाफ दहेज से जुड़ी प्रताड़ना और क्रूरता के विशेष आरोप सामने आए हैं। इसलिए इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि BNS की धारा 85, 61 और 115(2) के तहत कोई अपराध नहीं बनता।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच हर विवाद, असहमति या खराब व्यवहार को स्वतः कानूनी क्रूरता नहीं माना जा सकता। क्रूरता इतनी गंभीर होनी चाहिए कि वह कानून में निर्धारित परिभाषा के दायरे में आती हो।
दहेज हत्या के मामले में कोर्ट ने कहा कि शादी के सात साल के भीतर महिला की मौत, सामान्य परिस्थितियों से अलग मौत और मौत से कुछ समय पहले दहेज से जुड़ी क्रूरता या प्रताड़ना जैसे पहलुओं की जांच ट्रायल में की जानी जरूरी है।
कोर्ट के मुताबिक, शारीरिक तनाव, मानसिक प्रताड़ना या अन्य परिस्थितियों का मेडिकल स्थिति पर असर पड़ सकता है। इसलिए केवल हार्ट अटैक को मौत का कारण बताने वाली पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर मामले को शुरुआती स्तर पर खत्म नहीं किया जा सकता। मेडिकल एक्सपर्ट और डॉक्टरों की गवाही, विसरा और टॉक्सिकोलॉजिकल जांच सहित अन्य सबूतों के आधार पर मौत की वास्तविक परिस्थितियों का फैसला ट्रायल के दौरान किया जाएगा।
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