KNEWS DESK- पितृपक्ष में पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। इसके समाप्त होते ही शारदीय नवरात्रि शुरू हो जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ कार्य के बाद देवी आराधना का यह क्रम पंचांग की तिथियों और हिंदू परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
हिंदू धर्म में सालभर मनाए जाने वाले पर्व और व्रतों का अपना अलग धार्मिक महत्व है। कई पर्वों के पीछे सदियों पुरानी परंपराएं और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। पितृपक्ष और शारदीय नवरात्रि का क्रम भी ऐसी ही धार्मिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है। पितृपक्ष में जहां पूर्वजों को याद करके उनके लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है, वहीं इसके समाप्त होते ही मां दुर्गा की आराधना का पर्व शारदीय नवरात्रि शुरू हो जाता है।
साल 2026 में पितृपक्ष की मुख्य श्राद्ध अवधि 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक रहेगी। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृपक्ष का समापन होगा। इसके अगले दिन यानी 11 अक्टूबर 2026, रविवार से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होगी। ऐसे में पितरों के स्मरण और देवी आराधना के बीच यह धार्मिक क्रम देखने को मिलता है।
धार्मिक मान्यताओं में पितरों यानी पूर्वजों को विशेष स्थान दिया गया है। पितृपक्ष के दौरान परिवार के दिवंगत सदस्यों का स्मरण करके उनके लिए श्राद्ध, तर्पण और दान करने की परंपरा है। माना जाता है कि इस अवधि में व्यक्ति अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करता है। हिंदू परंपरा में देव कार्य से पहले पितृ कार्य को भी महत्व दिया गया है। इसी वजह से पितृपक्ष में पहले पितरों का स्मरण और तर्पण करने की परंपरा बताई जाती है।
पितृपक्ष के बाद नवरात्रि आने का संबंध पंचांग की तिथियों से भी है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितरों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। कृष्ण पक्ष की अमावस्या के साथ पितृपक्ष का समापन होता है। इसके बाद आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होती है। इस तरह पंचांग के अनुसार पहले कृष्ण पक्ष में पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण का क्रम चलता है और उसके बाद शुक्ल पक्ष की शुरुआत के साथ देवी आराधना का पर्व आता है।
धार्मिक मान्यताओं में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का समय माना गया है। ऐसी मान्यता भी है कि इस अवधि में पितरों का पृथ्वी लोक से संबंध होता है और लोग उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण और दान करते हैं। पितृपक्ष के समाप्त होने के बाद अमावस्या के पश्चात शुक्ल पक्ष की शुरुआत होती है। धार्मिक परंपरा में इसे नई ऊर्जा और शुभता के आगमन से जोड़कर देखा जाता है।
शारदीय नवरात्रि को इसी नई शुरुआत और आदिशक्ति की उपासना का पर्व माना जाता है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। भक्त व्रत रखते हैं और विधि-विधान से देवी की आराधना करते हैं। इस तरह धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष और नवरात्रि के बीच पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और शक्ति की उपासना का क्रम जुड़ा हुआ है।
साल 2026 में 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृपक्ष का समापन होगा। इसके अगले दिन 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि शुरू होगी और 19 अक्टूबर तक चलेगी। यानी पितरों के लिए समर्पित अवधि पूरी होने के बाद देवी आराधना का पर्व शुरू होगा। यही वजह है कि हिंदू धार्मिक परंपरा में पितृपक्ष के बाद नवरात्रि के आगमन को विशेष क्रम के रूप में देखा जाता है।