अमित शाह ने कहा- जो देश अपनी परंपरा और इतिहास की रक्षा नहीं करता, वह खत्म हो जाता है

KNEWS DESK- केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को मुंबई की एशियाटिक सोसाइटी में आयोजित गणेश ज्ञानार्थी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की जरूरत पर जोर दिया। शाह ने कहा कि किसी भी देश की पहचान उसकी स्मृतियों, इतिहास, भाषा, संस्कृति और परंपराओं से बनती है। जो देश इनकी रक्षा नहीं करता, वह धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

अपने संबोधन में अमित शाह ने कहा कि सच्चा ज्ञान कभी किसी विचारधारा का बंधक नहीं होता। ज्ञान स्वयं एक विचारधारा है और इसे स्वतंत्र रूप से विकसित होने दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि ज्ञान को किसी सीमा या विचारधारा में बांध दिया जाए, तो उसके मूल अर्थ को ही बदल दिया जाता है।

शाह ने एशियाटिक सोसाइटी में संरक्षित ज्ञान, दस्तावेजों और संग्रह का उल्लेख करते हुए कहा कि अब जरूरत इस बात की है कि इस संपदा का इस्तेमाल भारत के निर्माण और पूरी मानवता के कल्याण के लिए किया जाए। उन्होंने कहा कि संस्था की स्थापना कब और किस उद्देश्य से हुई, इस पर चर्चा से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यहां मौजूद ज्ञान का उपयोग आधुनिक और महान भारत के निर्माण में कैसे किया जा सकता है।

नालंदा का उदाहरण दिया

अमित शाह ने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का उदाहरण देते हुए नालंदा विश्वविद्यालय का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत के ज्ञान को नष्ट करने के कई प्रयास हुए, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। शाह के मुताबिक, नालंदा के पुस्तकालय को जलाया जा सकता है, लेकिन लोगों की स्मृतियों, परंपराओं और सामूहिक चेतना में मौजूद ज्ञान को समाप्त नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि जो देश अपनी संस्कृति, इतिहास, भाषा, रिकॉर्ड, परंपराओं और व्याकरण को सुरक्षित रखता है, उसे लंबे समय तक गुलाम बनाए रखना संभव नहीं होता। भले ही ऐसा देश सदियों तक विदेशी शासन झेले, लेकिन उसकी मूल पहचान और ज्ञान परंपरा जीवित रहती है।

औपनिवेशिक नजरिए की आलोचना

शाह ने भारतीय इतिहास और ज्ञान की औपनिवेशिक व्याख्या की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि भारत की बौद्धिक परंपराओं का अध्ययन लंबे समय तक विदेशी दृष्टिकोण से किया गया। भारत का ज्ञान भारतीय आवाज में प्रस्तुत नहीं हुआ, बल्कि औपनिवेशिक नजरिए के माध्यम से उसकी व्याख्या की गई।

उन्होंने कहा कि इस तरह की व्याख्या का उद्देश्य भारतीय समाज के आत्मविश्वास को कमजोर करना और लोगों में हीन भावना पैदा करना था। शाह ने भरोसा जताया कि एशियाटिक सोसाइटी अपने नए नेतृत्व में भारतीय ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने और उसे देशभर में पहुंचाने का काम करेगी।

‘इतिहास मिटाना नहीं है डीकोलोनाइजेशन’

अमित शाह ने कहा कि डीकोलोनाइजेशन यानी उपनिवेशवाद से मुक्ति का अर्थ इतिहास को मिटाना नहीं है। इसका मतलब है कि इतिहास और ज्ञान को भारतीय दृष्टिकोण से, बिना किसी तोड़-मरोड़ के, पूरी सच्चाई के साथ लोगों के सामने रखा जाए।

उन्होंने कहा कि भारत की समृद्ध परंपराओं और ज्ञान को दुनिया के सामने सही संदर्भ में प्रस्तुत करना जरूरी है। एशियाटिक सोसाइटी में मौजूद संग्रह का अंतिम उद्देश्य देश, समाज, विश्व और मानवता का कल्याण होना चाहिए। शाह ने उम्मीद जताई कि संस्था भारतीय ज्ञान परंपरा की वाहक बनकर आने वाली पीढ़ियों तक इस विरासत को पहुंचाएगी।

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