महिला वोटरों के लिए बड़े वादे, लेकिन टिकट देने में पीछे क्यों? 2012 से 2022 तक BJP और SP का रिकॉर्ड

UP Politics: बीजेपी और समाजवादी पार्टी दोनों ही महिला वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए आर्थिक मदद और सुविधाओं से जुड़े बड़े ऐलान कर रहे हैं। लेकिन जब चुनाव में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की बात आती है, तो दोनों दलों का रिकॉर्ड अपेक्षाकृत कमजोर नजर आता है। 2012, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े इस तस्वीर को साफ करते हैं।

Knews Desk– उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। राजनीतिक दल अभी से ऐसे मुद्दों पर फोकस कर रहे हैं, जिनका सीधा असर महिला मतदाताओं पर पड़ सकता है। बीजेपी की योगी सरकार हो या विपक्ष की समाजवादी पार्टी, दोनों ही महिलाओं के लिए योजनाओं और आर्थिक सहायता के वादों के जरिए उन्हें साधने की कोशिश में जुटे हैं।

समाजवादी पार्टी ने महिला समानता दिवस के मौके पर सत्ता में आने पर ‘स्त्री सम्मान समृद्धि योजना’ लागू करने का ऐलान किया है। पार्टी के मुताबिक इस योजना के तहत महिलाओं को हर साल 40 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी और भविष्य में इस रकम को बढ़ाने का भी वादा किया गया है।

वहीं, योगी सरकार भी महिलाओं और बेटियों को लेकर कई घोषणाएं कर रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में ‘लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति यात्रा योजना’ की शुरुआत करते हुए स्नातक स्तर की पढ़ाई करने वाली 50 हजार छात्राओं को अक्टूबर-नवंबर में स्कूटी देने की बात कही। इसके अलावा रक्षाबंधन के दौरान महिलाओं के लिए तीन दिन मुफ्त बस यात्रा की सुविधा का भी ऐलान किया गया। 60 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को इस योजना के तहत निशुल्क बस यात्रा की सुविधा देने की बात कही गई है।

दरअसल, पिछले कुछ चुनावों में महिला मतदाताओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हुई है। लोकसभा चुनाव से लेकर बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और असम जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों तक राजनीतिक दलों ने महिलाओं को अपने चुनावी एजेंडे के केंद्र में रखा है। लेकिन सवाल यह है कि महिलाओं के कल्याण के वादे करने वाली पार्टियां उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के मामले में कितनी आगे हैं?

2024 के लोकसभा चुनाव में देश की 543 सीटों के लिए कुल 8,360 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। इनमें सिर्फ 800 महिलाएं थीं, यानी कुल उम्मीदवारों का करीब 10 फीसदी। इन 800 महिला उम्मीदवारों में 279 निर्दलीय थीं, जबकि 267 गैर-मान्यता प्राप्त दलों से चुनाव लड़ीं। मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की ओर से सिर्फ 254 महिलाओं को टिकट मिला।

उत्तर प्रदेश के 2022 विधानसभा चुनाव में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं रही। 403 विधानसभा सीटों पर कुल 4,442 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा, जिनमें 559 महिलाएं थीं। यानी कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 13 फीसदी रही। हालांकि यह आंकड़ा 2017 के मुकाबले करीब 4 फीसदी अधिक था।

महिला उम्मीदवारों को टिकट देने के मामले में कांग्रेस सबसे आगे रही। पार्टी ने ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ अभियान के तहत 155 महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारा। बीजेपी ने 45, समाजवादी पार्टी ने 42 और बहुजन समाज पार्टी ने 38 महिलाओं को टिकट दिया।

559 महिला उम्मीदवारों में से 44 ने जीत हासिल की थी, जबकि बाद के उपचुनावों के बाद महिला विधायकों की संख्या 47 तक पहुंच गई। बीजेपी की 29 महिला उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहीं। समाजवादी पार्टी की 14 और कांग्रेस की एक महिला प्रत्याशी ने भी जीत दर्ज की। इसके अलावा अपना दल (सोनेलाल) की तीन महिला उम्मीदवार विधायक बनीं।

अगर 2017 के विधानसभा चुनाव पर नजर डालें तो उस समय कुल 485 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था। बीजेपी ने 44 महिलाओं को टिकट देकर सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया था। समाजवादी पार्टी ने 22, बसपा ने 20 और कांग्रेस ने 11 महिलाओं को मैदान में उतारा था। इस चुनाव में 41 महिला उम्मीदवारों को जीत मिली थी। बीजेपी और उसके सहयोगी अपना दल की 36 महिला प्रत्याशियों ने जीत हासिल की थी। बसपा और कांग्रेस की दो-दो तथा सपा की एक महिला उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रही थी। बाद में उपचुनावों के जरिए तीन और सीटें महिला विधायकों के खाते में गईं।

अब 2012 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो कुल 6,839 उम्मीदवारों में सिर्फ 583 महिलाएं थीं। यानी महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी करीब 8.5 फीसदी थी। उस चुनाव में बीजेपी ने 44 महिलाओं को टिकट दिया था, जबकि समाजवादी पार्टी ने 33 महिला प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था। राष्ट्रीय लोक दल ने 25, बसपा ने 19 और कांग्रेस ने 11 महिलाओं को टिकट दिया था।

2012 में 583 महिला उम्मीदवारों में से सिर्फ 35 चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच पाई थीं। इन आंकड़ों को देखें तो पिछले तीन विधानसभा चुनावों में महिला उम्मीदवारों की संख्या में बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन राजनीतिक दलों की ओर से महिलाओं को टिकट देने की हिस्सेदारी अभी भी सीमित रही है।

ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव कई मायनों में अहम होगा। एक तरफ बीजेपी और सपा महिला वोटरों के लिए आर्थिक सहायता, मुफ्त सुविधाओं और योजनाओं के जरिए बड़े वादे कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ यह देखना दिलचस्प होगा कि टिकट बंटवारे में दोनों दल महिलाओं को कितना राजनीतिक प्रतिनिधित्व देते हैं। असली सवाल यही है कि आधी आबादी को वोट बैंक के रूप में साधने से आगे बढ़कर क्या उन्हें सत्ता और राजनीति में बराबर हिस्सेदारी भी मिलेगी?

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