आर्थिक तंगी और घरेलू जिम्मेदारियों ने छीनी बचपन की पढ़ाई, कई बच्चियां छोटी उम्र में ही परिवार की मदद के लिए काम करने को मजबूर
Knews Desk- बेटियों के हाथों में जिस उम्र में किताब और कलम होनी चाहिए, उस उम्र में कई बच्चियां सुई-धागा, कढ़ाई और पतंग बनाने का काम कर रही हैं। बरेली के बाकरगंज, सराय खाम, हाजियापुर, शाहदाना, श्यामगंज और आसपास के इलाकों में आर्थिक तंगी के चलते कई बच्चियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति, घरेलू जिम्मेदारियां और शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी के कारण कुछ बच्चियां प्राथमिक शिक्षा पूरी करने से पहले ही स्कूल से दूर हो जाती हैं।
सरकार की ओर से बेटियों को शिक्षा से जोड़ने के लिए कई योजनाएं और अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अभी भी चुनौतीपूर्ण नजर आते हैं। कई परिवारों के सामने बच्चों की पढ़ाई और दो वक्त की रोटी में से किसी एक को चुनने की मजबूरी बनी हुई है।
परिवार का सहारा बनने के लिए पढ़ाई छोड़ी
आजमनगर की रिहाना के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। उनके पति रिक्शा चलाकर परिवार का खर्च उठाते हैं। पांच बच्चों में तीन बेटियां हैं, लेकिन आर्थिक परेशानियों के कारण कोई भी बेटी तीसरी कक्षा से आगे पढ़ाई नहीं कर सकी। घर की मदद के लिए बेटियां पतंग बनाने का काम करती हैं और इससे मिलने वाली थोड़ी-सी आमदनी परिवार के खर्च में लगती है।
इसी तरह जैबुननिशा के पति का निधन हो चुका है। पांच बेटियों की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। वह दूसरों के घरों में काम करके परिवार का पालन-पोषण करती हैं, जबकि उनकी बेटियां हथकरघा और कारचोबी का काम करके मां का हाथ बंटाती हैं।
मैनाज के परिवार की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। उनके पति लकवाग्रस्त हैं। ऐसे में परिवार की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए उनकी बेटियां कारचोबी का काम करती हैं। श्यामगंज की आमना के पति की मौत के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गई। उनकी तीनों बेटियां पतंग बनाने का काम करती हैं। आमना के मुताबिक, एक हजार पतंग बनाने पर करीब 100 रुपये मिलते हैं। ऐसे में परिवार के सामने बच्चों की पढ़ाई से पहले घर का खर्च चलाने की चुनौती खड़ी रहती है।
दाखिला लेने के बाद भी स्कूल से गायब
प्राथमिक विद्यालय काजी टोला में इस साल 57 बच्चों का पंजीकरण हुआ है, जिसमें करीब 20 छात्राएं हैं। प्राथमिक विद्यालय बांस मंडी में 35 बच्चे दर्ज हैं, जबकि ख्वाजा कुतुब स्कूल में सिर्फ दो छात्र हैं।
प्राथमिक विद्यालय हाजियापुर में पिछले साल 78 बच्चे पंजीकृत थे, लेकिन इस साल यह संख्या घटकर 58 रह गई है। स्कूल के प्रधानाध्यापक के मुताबिक, कई छात्राएं दाखिला लेने के बाद नियमित रूप से स्कूल नहीं आतीं। जरी-जरदोजी, सिलाई-कढ़ाई और घर के कामकाज के चलते उनका स्कूल छूट जाता है। इसके अलावा शिक्षकों की कमी और एसआईआर, जनगणना समेत दूसरे सरकारी कार्यों में शिक्षकों की ड्यूटी लगने का असर भी स्कूलों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
बेटियों की शिक्षा को लेकर आज भी पुरानी सोच
शाहदाना की फातिमा अपने पोते-पोतियों की देखभाल करती हैं। उनके पति का कई साल पहले निधन हो चुका है और उनका बेटा पंजाब में मजदूरी करता है। घर की तीन बेटियां 15 साल तक की उम्र की हैं, लेकिन वे स्कूल नहीं जातीं।
फातिमा के मुताबिक, स्कूल करीब एक किलोमीटर दूर है और बच्चियों को स्कूल तक पहुंचाने के लिए परिवार में कोई उपलब्ध नहीं है। साथ ही परिवार में यह सोच भी है कि बेटियां बड़ी होकर शादी के बाद दूसरे घर चली जाएंगी, इसलिए उनकी पढ़ाई पर ज्यादा खर्च करने की जरूरत नहीं है।
मां की मौत के बाद बेटियों ने संभाला घर
हाजियापुर के मोहम्मद रईस की पत्नी का भी कई साल पहले निधन हो चुका है। परिवार में पांच बेटियां हैं, जिन्होंने घर की जिम्मेदारियां संभाल ली हैं। बड़ी बेटी नाजिश बताती हैं कि जब उनकी मां का निधन हुआ, तब वह नौवीं कक्षा में पढ़ रही थीं। मां की मौत के बाद पढ़ाई छूट गई और उन्हें परिवार की जिम्मेदारियों में लगना पड़ा।
उनके पिता हृदय रोग से पीड़ित हैं और नियमित रूप से काम नहीं कर पाते। ऐसे में परिवार का खर्च चलाने के लिए बेटियां जरी का काम करती हैं।
घर-घर जाकर बच्चों को स्कूल से जोड़ने की तैयारी
शिक्षा विभाग का कहना है कि स्कूल से बाहर रह रहे बच्चों की पहचान के लिए अभियान चलाया जाएगा। डीएलएड प्रशिक्षुओं को घर-घर भेजकर ऐसे बच्चों को चिह्नित किया जाएगा और उन्हें दोबारा शिक्षा से जोड़ने की कोशिश की जाएगी। खंड शिक्षा अधिकारी तौसीफ के मुताबिक, बच्चों को स्कूलों से जोड़ने के लिए हर साल सर्वे कराया जाता है। अधिकारियों को जिम्मेदारी देकर स्कूल से बाहर बच्चों की पहचान और उनके दाखिले की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह ने भी अधिकारियों को बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
बरेली के इन इलाकों की तस्वीर यह सवाल जरूर खड़ा करती है कि जब परिवार की आर्थिक मजबूरी बचपन की पढ़ाई पर भारी पड़ जाए, तो सरकारी योजनाओं का लाभ इन बच्चियों तक आखिर कैसे पहुंचेगा। कलम और किताब की उम्र में सुई-धागा थामने वाली इन बेटियों को शिक्षा से जोड़ना प्रशासन के साथ-साथ समाज के लिए भी बड़ी चुनौती है।