KNEWS DESK- सावन का महीना भगवान शिव की उपासना के लिए बेहद पवित्र माना जाता है। इस दौरान शिव मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालु शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और गंगाजल अर्पित कर भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद मांगते हैं। वहीं देशभर में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन और जलाभिषेक के लिए भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
शिवलिंग और ज्योतिर्लिंग दोनों ही भगवान शिव के स्वरूप माने जाते हैं, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इनकी उत्पत्ति और महत्व में अंतर है। आइए जानते हैं सामान्य शिवलिंग और ज्योतिर्लिंग में क्या अंतर माना जाता है और 12 ज्योतिर्लिंगों को इतना विशेष क्यों कहा जाता है।
क्या होता है शिवलिंग?
सनातन धर्म में शिवलिंग को भगवान शिव के निराकार स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। देशभर के शिव मंदिरों के साथ-साथ कई श्रद्धालु अपने घरों में भी शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा करते हैं। सामान्य शिवलिंग पत्थर, मिट्टी, धातु, संगमरमर, स्फटिक सहित विभिन्न पदार्थों से बनाए जा सकते हैं। मंदिरों में शिवलिंग स्थापित करते समय विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। इसके बाद नियमित रूप से पूजा, अभिषेक और आरती की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवलिंग पर जल चढ़ाने, बेलपत्र अर्पित करने और भगवान शिव के मंत्रों का जाप करने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं।
कैसे हुई ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति?
ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव से संबंधित है। कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। इसी दौरान भगवान शिव उनके सामने एक अनंत प्रकाश स्तंभ के रूप में प्रकट हुए।भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु से इस प्रकाश स्तंभ का आदि और अंत खोजने को कहा। दोनों ने काफी प्रयास किया, लेकिन इसकी सीमा का पता नहीं लगा सके। इसके बाद उन्होंने भगवान शिव की अनंत सत्ता को स्वीकार किया। धार्मिक परंपरा में भगवान शिव के इसी ज्योति स्वरूप से ज्योतिर्लिंग की अवधारणा जुड़ी मानी जाती है। शिव पुराण में 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों का विशेष वर्णन मिलता है।
ज्योतिर्लिंग का क्या अर्थ है?
‘ज्योतिर्लिंग’ दो शब्दों से मिलकर बना है—‘ज्योति’ और ‘लिंग’। ज्योति का अर्थ प्रकाश या दिव्य तेज और लिंग भगवान शिव के प्रतीकात्मक स्वरूप को दर्शाता है। इस प्रकार ज्योतिर्लिंग को भगवान शिव के दिव्य प्रकाश स्वरूप से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन स्थानों पर भगवान शिव विशेष रूप से ज्योति स्वरूप में प्रकट हुए थे। यही वजह है कि देशभर के शिवभक्तों के बीच 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष धार्मिक महत्व है।
सामान्य शिवलिंग और ज्योतिर्लिंग में क्या अंतर है?
सामान्य शिवलिंग और ज्योतिर्लिंग दोनों में ही भगवान शिव की आराधना की जाती है। मुख्य अंतर इनके धार्मिक महत्व और उनसे जुड़ी मान्यताओं का है। सामान्य शिवलिंग मंदिर या घर में विधि-विधान से स्थापित किया जा सकता है। कई शिवलिंग मानव निर्मित होते हैं, जबकि प्राकृतिक या स्वयंभू शिवलिंगों की भी परंपरा है। स्थापित शिवलिंग की पूजा-अर्चना और अभिषेक निर्धारित धार्मिक विधियों से किया जाता है।
इसके विपरीत, ज्योतिर्लिंग उन 12 विशेष तीर्थस्थलों को कहा जाता है जिनका उल्लेख शिव परंपरा में भगवान शिव के ज्योति स्वरूप से जुड़े अत्यंत पवित्र स्थानों के रूप में मिलता है। इसलिए हर ज्योतिर्लिंग शिवलिंग का ही स्वरूप है, लेकिन हर शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग नहीं कहा जाता।
क्यों खास माने जाते हैं 12 ज्योतिर्लिंग?

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग सनातन धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल हैं। मान्यता है कि इन पवित्र स्थानों पर भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। सावन और महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर ज्योतिर्लिंग मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त यहां भगवान शिव का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक कर सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।धार्मिक विश्वास है कि श्रद्धापूर्वक ज्योतिर्लिंग के दर्शन और भगवान शिव की उपासना करने से आध्यात्मिक शांति मिलती है और भोलेनाथ की कृपा प्राप्त होती है।
भारत में कहां हैं भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग?
भारत के अलग-अलग राज्यों में भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंग स्थित हैं। इनमें गुजरात का सोमनाथ, आंध्र प्रदेश का मल्लिकार्जुन, मध्य प्रदेश के महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर, उत्तराखंड का केदारनाथ, महाराष्ट्र के भीमाशंकर और त्र्यंबकेश्वर, उत्तर प्रदेश का काशी विश्वनाथ, झारखंड का बैद्यनाथ, गुजरात का नागेश्वर, तमिलनाडु का रामेश्वरम और महाराष्ट्र का घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग शामिल हैं। इन सभी तीर्थस्थलों से अलग-अलग पौराणिक कथाएं और धार्मिक परंपराएं जुड़ी हुई हैं।
सावन में शिवलिंग के जलाभिषेक का महत्व
सावन में भगवान शिव की पूजा और शिवलिंग पर जलाभिषेक का विशेष महत्व माना गया है। इस महीने में भक्त गंगाजल, दूध और जल से भगवान शिव का अभिषेक करते हैं तथा बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित करते हैं। कांवड़ यात्रा करने वाले श्रद्धालु भी पवित्र नदियों से जल लेकर शिव मंदिरों तक पहुंचते हैं और शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि सावन में सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करने से भक्तों पर भोलेनाथ की कृपा बनी रहती है।