Knews Desk: चीन ने 1 जुलाई 2026 से नया एथनिक यूनिटी लॉ (Ethnic Unity Law) लागू किया है। इस कानून को लेकर दुनियाभर में बहस छिड़ गई है। चीन का कहना है कि यह कानून राष्ट्रीय एकता, सामाजिक स्थिरता और अलगाववाद पर रोक लगाने के लिए लाया गया है। वहीं, मानवाधिकार संगठनों और कई देशों का आरोप है कि इसके जरिए चीन अपने यहां रहने वाले अल्पसंख्यक समुदायों की भाषा, संस्कृति और धार्मिक पहचान को कमजोर करना चाहता है।चीन के अनुसार, देश में अलग-अलग जातीय समूहों के बीच एक समान राष्ट्रीय पहचान विकसित करना समय की जरूरत है। सरकार का दावा है कि इससे अलगाववादी गतिविधियों और उग्रवाद पर नियंत्रण लगेगा, सामाजिक समरसता बढ़ेगी और आर्थिक विकास को गति मिलेगी। सरकार का यह भी कहना है कि सभी नागरिकों के लिए एक समान भाषा और राष्ट्रीय पहचान देश को मजबूत बनाएगी।
हालांकि, इस कानून के सबसे अधिक विरोध की वजह ‘सिनाइज़ेशन’ (Sinicization) की नीति है। इसका मतलब है कि अलग-अलग समुदायों को चीनी संस्कृति, भाषा और जीवनशैली के अनुरूप ढालना। आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया में अल्पसंख्यक समुदायों की अपनी भाषा, पारंपरिक पहनावा, धार्मिक मान्यताएं और सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे खत्म हो सकती है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून के तहत शिक्षा व्यवस्था में बदलाव किए जा सकते हैं। स्कूलों में स्थानीय भाषाओं की जगह मैंडरिन को अधिक महत्व दिया जा सकता है। धार्मिक संस्थानों और गतिविधियों पर भी सरकार का नियंत्रण बढ़ सकता है। इसके अलावा स्थानीय प्रशासन को कानून लागू करने के लिए व्यापक अधिकार मिलने की बात भी कही जा रही है।
यह कानून 12 मार्च 2026 को चीन की संसद से पारित हुआ था और राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उसी दिन इस पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद इसे 1 जुलाई 2026 से पूरे देश में लागू कर दिया गया। हालांकि, इसके कई प्रावधानों को स्थानीय प्रशासन अपने-अपने तरीके से लागू करेगा, इसलिए इसका वास्तविक प्रभाव आने वाले समय में और स्पष्ट होगा।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस कानून को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और यूरोपीय संघ के कई देशों ने इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों के खिलाफ बताया है। इन देशों का कहना है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विविधता और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भी चीन से पारदर्शिता बरतने और स्वतंत्र जांच की अनुमति देने की मांग की है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इस कानून का असर केवल सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। यदि इसे सख्ती से लागू किया गया तो स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार, शिक्षा और वैश्विक व्यापार पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां पहले से ही अपने निवेश और सप्लाई चेन का दोबारा आकलन कर रही हैं।कुल मिलाकर, चीन का नया एथनिक यूनिटी लॉ राष्ट्रीय एकता के नाम पर लागू किया गया एक बड़ा कानूनी कदम है। सरकार इसे देश की स्थिरता और विकास के लिए जरूरी बता रही है, जबकि आलोचकों को डर है कि इससे अल्पसंख्यकों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान प्रभावित होगी। आने वाले समय में इस कानून का वास्तविक असर और इसके दूरगामी परिणाम दुनिया के सामने और स्पष्ट होंगे।