KNEWS DESK- सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बड़ा फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग के पक्ष में निर्णय दिया है। अदालत ने साफ कहा कि SIR कराना चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है और इसमें किसी प्रकार की अवैधता नहीं पाई गई है।
इस फैसले के साथ ही चुनाव आयोग को बड़ी कानूनी जीत मिली है। कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट की शुद्धता और विश्वसनीयता लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव है, और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि मतदाता सूची को समय-समय पर अपडेट किया जाए।
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि SIR का उद्देश्य केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि संवैधानिक महत्व का है, क्योंकि यह सीधे तौर पर निष्पक्ष चुनावों से जुड़ा हुआ है। अदालत ने कहा कि मतदाता सूची में त्रुटियों को सुधारना और फर्जी या दोहराए गए नामों को हटाना एक आवश्यक प्रक्रिया है।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि अंतिम बड़े स्तर के पुनरीक्षण के बाद कई दशकों का समय बीत चुका था, जिसके दौरान बड़े पैमाने पर जनसंख्या में बदलाव, शहरीकरण और प्रवासन जैसी स्थितियां उत्पन्न हुईं, जिससे वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों की संभावना बढ़ गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया को “NRC जैसी कवायद” बताते हुए चुनौती दी थी और दावा किया था कि चुनाव आयोग के पास इस तरह की व्यापक जांच करने का अधिकार नहीं है। इसके अलावा 65 लाख नामों को हटाए जाने और प्रक्रिया की समयसीमा पर भी सवाल उठाए गए थे।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों को बरकरार रखा और कहा कि आयोग ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का कोई उल्लंघन नहीं किया है।
इस फैसले के बाद अब चुनाव आयोग को देशभर में मतदाता सूची सुधार की प्रक्रिया को और मजबूती से आगे बढ़ाने का कानूनी आधार मिल गया है।