Knews Desk– मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जारी संकट ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। वैश्विक तेल सप्लाई के सबसे अहम समुद्री रास्तों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संकट और गहराया तो दुनिया भर में तेल और गैस की कीमतों में बड़ा असर दिखाई दे सकता है।
दुनिया की तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा गुजरता है होर्मुज से
होर्मुज जलडमरूमध्य को दुनिया की ऊर्जा सप्लाई का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है। वैश्विक स्तर पर समुद्री रास्ते से होने वाली करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस सप्लाई इसी मार्ग से होकर गुजरती है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का तनाव सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार को प्रभावित करता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, हालिया संकट के बाद कई तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इससे कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है और निवेशकों में डर का माहौल बन गया है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से ऊपर जा रही हैं। कई रिपोर्ट्स में आशंका जताई गई है कि अगर संकट लंबा चला तो तेल की कीमतें 120 से 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। फिलहाल तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने लगा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि होने पर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर सीधा असर पड़ेगा। इससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं और महंगाई भी तेजी से बढ़ने की आशंका है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह संकट?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। सऊदी अरब, इराक, यूएई और कतर जैसे देशों से आने वाला तेल और LNG अधिकतर होर्मुज रास्ते से होकर आता है। ऐसे में इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर संकट लंबे समय तक जारी रहा तो भारत में ईंधन महंगा होने के साथ-साथ ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर भी असर दिख सकता है। इसके अलावा गैस और उर्वरक की कीमतें बढ़ने का खतरा भी बना हुआ है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी खतरा
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि यह संकट 1970 के दशक के तेल संकट के बाद सबसे बड़ा ऊर्जा संकट बन सकता है। IMF और IEA जैसी संस्थाओं ने कहा है कि अगर सप्लाई बाधित रही तो दुनिया भर में महंगाई और आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल दुनिया की नजरें मध्य पूर्व की स्थिति पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में हालात कैसे बदलते हैं, इसी पर तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।