आखिरी सफर में बजते रहे सायरन… उन्नाव में भाई ने निभाया वादा, 16 एंबुलेंस के काफिले में निकली अंतिम यात्रा

शिव शंकर सविता- उत्तर प्रदेश के उन्नाव से एक ऐसी भावुक कहानी सामने आई है, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। यहां रहने वाले 50 वर्षीय कमलेश, जो पेशे से राजमिस्त्री थे, लंबे समय से लिवर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। बीमारी से लड़ते-लड़ते आखिरकार शनिवार रात उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन जाने से पहले उन्होंने अपने छोटे भाई से एक ऐसी इच्छा जताई, जिसे सुनकर हर कोई भावुक हो जाए। कमलेश की आखिरी ख्वाहिश थी “जब मेरी अंतिम यात्रा निकले, तो उसमें ज्यादा से ज्यादा एंबुलेंस शामिल हों।” यह बात उन्होंने अपने छोटे भाई विमलेश से कही थी, जो पेशे से एंबुलेंस चालक हैं। भाई ने भी बिना देर किए उनसे वादा किया था कि उनकी यह इच्छा जरूर पूरी होगी।

पहले लोग हुए हैरान, सच्चाई जानकर हुए भावुक

रविवार को जब कमलेश की अंतिम यात्रा निकली, तो यह कोई साधारण यात्रा नहीं थी। करीब 16 एंबुलेंस का लंबा काफिला सायरन बजाते हुए उनके घर से शुक्लागंज श्मशान घाट की ओर बढ़ा। सड़क पर गूंजते सायरन और एक साथ चलती एंबुलेंसों को देखकर आसपास के लोग पहले तो घबरा गए, लेकिन जब उन्हें इस अनोखी अंतिम यात्रा की सच्चाई पता चली, तो हर किसी की आंखें भर आईं। विमलेश ने अपने भाई से किया वादा निभाने के लिए अपने एंबुलेंस चालक दोस्तों को बुलाया और उन्हें कमलेश की आखिरी इच्छा के बारे में बताया। दोस्ती और इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए सभी चालक बिना किसी हिचकिचाहट के तैयार हो गए। खास बात यह रही कि इस पूरे काफिले में शामिल किसी भी चालक ने कोई पैसे नहीं लिए यह सिर्फ एक भाई के प्यार और सम्मान के लिए किया गया प्रयास था।

बालूघाट में हुआ अंतिम संस्कार

दोपहर करीब 1:20 बजे जब यह काफिला बालूघाट मोड़ से मिश्रा कॉलोनी स्थित श्मशान घाट की ओर बढ़ा, तो सड़क पर खड़े लोग स्तब्ध रह गए। एक के पीछे एक चलती एंबुलेंस, गूंजते सायरन और गमगीन माहौल ने इस अंतिम यात्रा को बेहद खास और यादगार बना दिया। विमलेश ने बताया कि वह तीन भाई थे सबसे बड़े महेश, फिर कमलेश और सबसे छोटे वह खुद। कमलेश के निधन से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। उनकी पत्नी सरला, बेटी रुचि और छोटे बेटे तनिष्क का रो-रोकर बुरा हाल है। इस दौरान एंबुलेंस चालक राजेश कुमार सिंह ने कहा कि “हमारे एक साथी के भाई की आखिरी इच्छा थी, इसलिए हम सभी उनकी इच्छा पूरी करने आए। यह हमारे लिए पैसे का नहीं, बल्कि इंसानियत और रिश्तों का सवाल था।”

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