KNEWS DESK- प्रयागराज में आयोजित विश्व प्रसिद्ध माघ मेला अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु त्रिवेणी संगम के पावन तट पर स्नान कर आस्था की डुबकी लगा रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माघ मास में संगम स्नान और पूजा-अर्चना करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इस वर्ष मेले का छठा और अंतिम महास्नान 15 फरवरी 2026, रविवार को आयोजित होगा, जिसके साथ ही 44 दिनों तक चले इस आध्यात्मिक आयोजन का समापन हो जाएगा।
पंचांग और मेला प्रशासन के अनुसार 15 फरवरी 2026 को माघ मेले का अंतिम प्रमुख स्नान होगा। संयोगवश इसी दिन महाशिवरात्रि का पावन पर्व भी मनाया जाएगा, जिससे इस महास्नान का महत्व कई गुना बढ़ गया है। श्रद्धालु तड़के सुबह से ही संगम तट पर पहुंचकर स्नान करेंगे और भगवान शिव का अभिषेक कर आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। मान्यता है कि इस दिन संगम में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
महाशिवरात्रि पर बन रहे शुभ योग
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस वर्ष महाशिवरात्रि पर कई दुर्लभ और शुभ योग बन रहे हैं। ऐसे शुभ संयोग में किया गया स्नान, दान और पूजा अत्यंत फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु उपवास रखकर रात्रि जागरण करेंगे और शिवालयों में विशेष पूजा-अर्चना करेंगे। त्रिवेणी संगम पर सुबह से लेकर देर रात तक आस्था का सैलाब उमड़ने की संभावना है।
महाशिवरात्रि और संगम स्नान का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि को भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, रुद्राभिषेक, बिल्वपत्र अर्पण और शिव मंत्रों का जाप विशेष फलदायी बताया गया है। मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दिन संगम में स्नान करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति, पापों से मुक्ति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
क्यों विशेष है प्रयागराज का माघ मेला?
प्रयागराज का माघ मेला सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आयोजन है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर आयोजित यह मेला हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। पूरे माघ मास में श्रद्धालु कल्पवास करते हैं, साधना, जप-तप और धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेते हैं। साधु-संतों और विभिन्न अखाड़ों की उपस्थिति मेले की आध्यात्मिक गरिमा को और भी बढ़ा देती है।
आस्था और आध्यात्मिकता का संगम
44 दिनों तक चलने वाला यह मेला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और परंपरा का अद्भुत संगम भी है। अंतिम महास्नान के साथ ही माघ मेले का औपचारिक समापन होगा, लेकिन श्रद्धालुओं के मन में इसकी आध्यात्मिक छाप लंबे समय तक बनी रहेगी।