KNEWS DESK- हर वर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जानकी जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। यह पर्व माता सीता, जिन्हें जानकी भी कहा जाता है, के जन्मोत्सव के रूप में जाना जाता है। इस शुभ दिन भगवान श्रीराम और माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जानकी जयंती के दिन विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। विशेष रूप से विवाहित महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से पति की आयु दीर्घ होती है और वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है।
व्रत और पूजा का महत्व
इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ जानकी जयंती की व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। कथा का श्रवण और पाठ करने से घर-परिवार में खुशहाली बनी रहती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
जानकी जयंती की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय मिथिला नगरी में भयंकर अकाल पड़ा हुआ था। वर्षों तक वर्षा न होने के कारण जनता त्रस्त थी। मिथिला के राजा जनक ने अकाल से मुक्ति पाने के लिए अनेक यज्ञ करवाए और ऋषि-मुनियों से परामर्श लिया। राजा जनक स्वयं भी प्रजा की भलाई के लिए खेत जोतने निकल पड़े। जब वे हल से भूमि जोत रहे थे, तभी उनका हल एक स्थान पर अटक गया। कई प्रयासों के बाद भी जब हल नहीं निकला, तो उस स्थान की मिट्टी हटाई गई।
मिट्टी हटाते ही वहां से एक अद्भुत कन्या प्रकट हुई। राजा जनक निःसंतान थे, इसलिए उन्होंने उस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। जैसे ही कन्या धरती से प्रकट हुई, आकाश से मूसलाधार वर्षा होने लगी और अकाल का अंत हो गया। राजा जनक ने उस कन्या का नाम सीता रखा, क्योंकि उनका प्रकट होना धरती से हुआ था। माता सीता के आगमन से मिथिला में खुशहाली लौट आई और खेतों में फिर से हरियाली छा गई।
जानकी जयंती मनाने की परंपरा
मान्यता है कि जिस दिन माता सीता धरती से प्रकट हुई थीं, वही दिन फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी थी। तभी से इस तिथि को जानकी जयंती के रूप में मनाया जाता है।
जानकी जयंती केवल एक पर्व नहीं, बल्कि धर्म, त्याग और नारी शक्ति का प्रतीक है। इस दिन श्रद्धा, विश्वास और भक्ति के साथ माता सीता और भगवान राम की पूजा करने से जीवन में सकारात्मकता और मंगल का संचार होता है।