संगठन कहेगा तो तुरंत पद छोड़ दूंगा… RSS प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान

डिजिटल डेस्क- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रविवार को अपने पद और भविष्य को लेकर चल रही तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया। संघ के एक शताब्दी कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह संगठन की आज्ञा के अनुसार ही कार्य करते हैं और जिस दिन RSS उनसे पद छोड़ने को कहेगा, वह बिना किसी देरी के ऐसा करेंगे। भागवत का यह बयान ऐसे समय आया है, जब पिछले कुछ दिनों से संघ के अगले प्रमुख और उनके कार्यकाल को लेकर चर्चाएं तेज थीं। मोहन भागवत ने बताया कि 75 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद उन्होंने स्वयं संघ को अपनी स्थिति से अवगत कराया था। उन्होंने कहा, “आमतौर पर माना जाता है कि 75 साल के बाद बिना किसी पद के काम करना चाहिए। मैंने भी 75 साल पूरे होने पर संघ को जानकारी दी, लेकिन संघ ने मुझसे कहा कि काम जारी रखिए।” उन्होंने दो टूक कहा कि संघ जो भी जिम्मेदारी देगा, वह उसे पूरी निष्ठा से निभाएंगे। भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि RSS में सरसंघचालक का कोई चुनाव नहीं होता। उन्होंने बताया कि क्षेत्रीय और प्रांतीय प्रमुखों की सहमति से संघ प्रमुख की नियुक्ति की जाती है। अपने चिर-परिचित हल्के अंदाज़ में उन्होंने कहा कि संघ अपने स्वयंसेवकों से “खून के आखिरी कतरे तक काम लेता है” और अब तक संघ के इतिहास में किसी को रिटायर होने की नौबत नहीं आई है।

अंग्रेज़ी कभी RSS की कार्यभाषा नहीं बनेगी

कार्यक्रम के दौरान भाषा को लेकर भी मोहन भागवत ने संघ का रुख साफ किया। उन्होंने कहा कि अंग्रेज़ी कभी भी RSS की कार्यभाषा नहीं बनेगी, क्योंकि यह भारतीय भाषा नहीं है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ अंग्रेज़ी का विरोधी नहीं है। भागवत बोले, “जहां अंग्रेज़ी की ज़रूरत होती है, वहां उसका इस्तेमाल किया जाता है। हमें अंग्रेज़ी इतनी अच्छी तरह आनी चाहिए कि अंग्रेज़ी बोलने वाले भी सुनने को तैयार हों।” साथ ही उन्होंने यह संदेश भी दिया कि अंग्रेज़ी सीखने के चक्कर में अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को भूलना ठीक नहीं है। संघ भारतीय समाज के बीच काम करता है और उसकी जड़ें भारतीय भाषाओं और संस्कृति में ही हैं।

संघ का काम संस्कार देना, प्रचार करना नहीं

मोहन भागवत ने संघ के कामकाज और उसकी कार्यशैली पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि RSS का मूल उद्देश्य संस्कार देना है, न कि प्रचार करना। उन्होंने स्वीकार किया कि संघ अपने कार्यों के प्रचार-प्रसार में अपेक्षाकृत पीछे रहा है, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी कि अत्यधिक प्रचार से प्रसिद्धि और फिर अहंकार पैदा होता है, जिससे संगठन और व्यक्ति दोनों को बचना चाहिए। भागवत के इस बयान को संघ की विचारधारा और कार्यसंस्कृति को समझाने वाला अहम संदेश माना जा रहा है। उनका साफ कहना है कि संगठन व्यक्ति से बड़ा है और पद कोई स्थायी चीज नहीं।

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