डिजिटल डेस्क- दिल्ली और नोएडा में कुछ ही दिनों के अंतराल पर हुई दो दर्दनाक मौतों ने सड़क सुरक्षा और जिम्मेदारी तय करने वाली व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों मामलों में युवक सड़क पर खुले छोड़े गए गड्ढों में गिरकर मारे गए। फर्क सिर्फ इतना रहा कि एक गड्ढा सरकारी एजेंसी का था और दूसरा प्राइवेट बिल्डर का, लेकिन लापरवाही का पैटर्न बिल्कुल एक जैसा है। ताजा मामला दिल्ली के जनकपुरी इलाके का है, जहां दिल्ली जल बोर्ड द्वारा खोदे गए एक गहरे गड्ढे में गिरकर कमल नाम के युवक की मौत हो गई। इससे पहले नोएडा सेक्टर-150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की जान भी ठीक इसी तरह खुले गड्ढे में गिरने से चली गई थी।
जनकपुरी हादसा: अंधेरे में दिखा नहीं गड्ढा, चली गई जान
जनकपुरी में कमल रोज की तरह रात में काम खत्म कर घर लौट रहा था। वह रोहिणी स्थित HDFC बैंक में कार्यरत था और रात करीब 11 बजे उसकी शिफ्ट खत्म होती थी। घर वालों से आखिरी बातचीत में उसने कहा था कि वह जनकपुरी डिस्ट्रिक्ट सेंटर में है और 10 मिनट में घर पहुंच जाएगा, लेकिन वह कभी नहीं लौटा। रात भर परिजन उसकी तलाश में 7–8 थानों के चक्कर लगाते रहे। आरोप है कि पुलिस ने शुरुआत में मदद नहीं की। सुबह करीब 7 बजे सूचना मिली कि कमल का शव सड़क पर खुले गड्ढे से बरामद हुआ है। जिस गड्ढे में वह गिरा, वहां ना बैरीकेड था, ना चेतावनी बोर्ड और ना ही लाइटिंग। हादसे के बाद सुबह वहां पर्दे और सुरक्षा इंतजाम लगाए गए, यानी सुरक्षा मौत के बाद की गई।
नोएडा में भी वही कहानी, वही लापरवाही
कुछ दिन पहले नोएडा सेक्टर-150 में युवराज मेहता की मौत भी इसी तरह हुई थी। एक प्राइवेट बिल्डर द्वारा खोदे गए गड्ढे में उसकी कार गिर गई थी। गड्ढे में पानी भरा हुआ था। युवराज ने मदद के लिए फोन भी किया, लेकिन घना कोहरा और अंधेरा उसकी जान ले गया। बाद में जांच में सामने आया कि गड्ढा नियमों के खिलाफ खोदा गया था और इस मामले में बिल्डर की गिरफ्तारी भी हुई।
एक जैसी लापरवाही, एजेंसी अलग
दोनों मामलों में
- गड्ढे सड़क पर खुले छोड़े गए
- बैरीकेड, साइन बोर्ड, लाइटिंग नहीं थी
- हादसे के बाद ही कवर-अप जैसा माहौल बना
- जिम्मेदारी तय करने में एजेंसियां उलझती रहीं
जांच के आदेश, लेकिन सवाल कायम
दिल्ली मामले में क्षेत्रीय मंत्री आशीष सूद ने जांच के आदेश दिए हैं कि यह लापरवाही दिल्ली जल बोर्ड की थी या किसी अन्य एजेंसी की। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ऐसी जांचें कब तक होती रहेंगी और कितनी जानें जाने के बाद सुरक्षा मानक लागू होंगे?