डिजिटल डेस्क- केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश किए गए आम बजट को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के बाद अब बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने भी बजट पर सवाल खड़े करते हुए केंद्र सरकार की मंशा और नीतियों पर निशाना साधा है। मायावती ने इशारों-इशारों में सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि बजट सत्ताधारी दल की नीति और नीयत का आईना होता है, जिससे यह साफ झलकता है कि सरकार वास्तव में गरीब, वंचित और बहुजन हितैषी है या फिर बड़े पूंजीपतियों और धन्नासेठों की समर्थक बनकर रह गई है। मायावती ने कहा कि केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह बजट आम गरीब जनता को वास्तव में कितनी राहत देगा। केवल योजनाओं और घोषणाओं की लंबी फेहरिस्त पेश कर देना ही काफी नहीं है। जरूरी यह है कि उन पर सही नीयत से अमल हो और उसका सीधा लाभ आम जनता के जीवन में दिखाई दे। उन्होंने कहा कि सर्वसमाज के हित की बातें हर बजट में होती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इससे अलग नजर आती है।
बजट में घोषित योजनाओं और परियोजनाओं पर भी जताया संदेह
बसपा सुप्रीमो ने बजट में घोषित योजनाओं और परियोजनाओं को लेकर भी संदेह जताया। उन्होंने कहा कि संसद में पेश किए गए बजट में जिन योजनाओं, वादों और आश्वासनों का जिक्र किया गया है, उनके नाम तो बहुत बड़े और आकर्षक हैं, लेकिन भविष्य में इनके परिणाम क्या होंगे, इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मायावती ने कहा कि बेहतर होगा कि इन योजनाओं का दर्शन और असर भी उतना ही बड़ा हो, जितना इनका नाम रखा गया है। उन्होंने दोहराया कि केवल भाषणों और कागजों में विकास दिखाने से आम आदमी की जिंदगी नहीं बदलती। मायावती ने खास तौर पर बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के कल्याणकारी संविधान का जिक्र करते हुए कहा कि अगर सरकार दीर्घकाल में आत्मनिर्भर भारत की बात कर रही है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि सरकारी क्षेत्र को कितना महत्व दिया गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या नीतियां संविधान की मूल भावना के अनुरूप हैं और क्या वंचित, दलित, पिछड़े और गरीब वर्गों को वास्तव में इसका लाभ मिल रहा है।
पूछे सरकार से तीखे सवाल
उन्होंने पिछले साल के बजट का हवाला देते हुए सरकार से तीखे सवाल किए। मायावती ने पूछा कि पिछले बजट में किए गए दावे, वादे और आशाएं क्या आज पूरी हुई हैं या फिर वे सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गईं। उन्होंने कहा कि यह देखना बेहद जरूरी है कि इन बजट घोषणाओं से आम लोगों के जीवन में कोई वास्तविक और सकारात्मक बदलाव आया है या नहीं। बसपा प्रमुख ने यह भी कहा कि विकास का आकलन केवल जीडीपी के आंकड़ों से नहीं किया जाना चाहिए। असली कसौटी यह है कि लोगों के जीवन में कितना गुणात्मक परिवर्तन आया है। व्यापक जनहित और देशहित से जुड़े मुद्दों पर कितना काम हुआ है, यह बजट की तारीफ करने से पहले जरूर परखा जाना चाहिए। मायावती ने सरकार से अपील की कि वह इन सवालों पर खुलकर रोशनी डाले, ताकि यह तय हो सके कि बजट वास्तव में “अच्छे दिन” लाने वाला है या फिर सिर्फ आंकड़ों और दावों तक सीमित है।