माघ मेले की कथित पुलिस बर्बरता पर सुप्रीम कोर्ट में PIL, नाबालिग साधु-बटुकों से मारपीट के गंभीर आरोप

KNEWS DESK – सुप्रीम कोर्ट में प्रयागराज माघ मेले के दौरान धार्मिक छात्रों के साथ कथित पुलिस बर्बरता को लेकर जनहित याचिका दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट के वकील उज्जवल गौर ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह याचिका दाखिल करते हुए धार्मिक पदाधिकारियों और साधु-संतों के साथ व्यवहार के लिए किसी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के अभाव और पुलिस को मिले असीमित विवेकाधिकार को चुनौती दी है।

यह याचिका खासतौर पर मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज माघ मेले से जुड़े उन वीडियो के संदर्भ में दायर की गई है, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए थे। इन वीडियो में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के साथ मौजूद नाबालिग वेदपाठी बटुकों और ब्रह्मचारियों के साथ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर जबरन घसीटने, मारपीट करने और दुर्व्यवहार की तस्वीरें सामने आई थीं। वीडियो में नाबालिग छात्रों को शिखा से खींचते हुए, सार्वजनिक रूप से पीटे जाने और एक तपस्वी को तब तक मारे जाने के दृश्य बताए गए हैं, जब तक उसके कपड़े फट न जाएं।

याचिका में इन घटनाओं को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का गंभीर उल्लंघन बताया गया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि यह कृत्य न सिर्फ क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक हैं, बल्कि मानवीय गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला भी हैं। इसके साथ ही, याचिका में यह भी कहा गया है कि जब धार्मिक व्यक्तियों को राज्य की ज्यादतियों का सामना करना पड़ता है, तो उनके लिए किसी प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र का पूरी तरह अभाव है।

वहीं, इसी दौरान एक अन्य अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बड़ा निर्देश दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि सभी स्कूलों में छात्राओं को बिना किसी शुल्क के सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जाएं और लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय सुनिश्चित किए जाएं। कोर्ट ने साफ किया कि ये सुविधाएं सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी—सभी स्कूलों में अनिवार्य रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है कि आदेशों का पालन न करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसमें निजी स्कूलों की मान्यता रद्द करने से लेकर सार्वजनिक संस्थानों में कमियों के लिए संबंधित राज्य सरकारों को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। अदालत ने इसे लैंगिक न्याय और शैक्षिक समानता की दिशा में एक जरूरी कदम बताया है।

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