आज स्वर बोझिल हैं और शब्द साथ नहीं दे रहे…. प्रयागराज में खत्म हुआ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का धरना

डिजिटल डेस्क- माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या स्नान को लेकर हुए विवाद के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने संगम नगरी प्रयागराज छोड़ने का फैसला कर लिया है। बीते करीब दस दिनों से धरने पर बैठे शंकराचार्य ने कहा कि प्रयाग में जो कुछ हुआ, उसने उन्हें भीतर तक आहत किया है। भारी मन और व्यथित भाव के साथ वे बिना संगम स्नान किए प्रयागराज से रवाना हो गए। मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य को कथित तौर पर मेला पुलिस द्वारा स्नान से रोके जाने का मामला सामने आया था। आरोप है कि इस दौरान उनके शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट भी की गई। इस घटना के बाद संत समाज में नाराजगी फैल गई और शंकराचार्य ने विरोध स्वरूप अपने शिविर के बाहर शांतिपूर्ण धरना शुरू किया, जो लगातार दस दिनों तक चला।

टकराव नहीं चाहते और अन्याय स्वीकार करना संभव नहीं

धरने के दौरान शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि वे टकराव नहीं चाहते, लेकिन अन्याय को स्वीकार करना उनके लिए संभव नहीं है। प्रयाग छोड़ते समय उन्होंने कहा, “आज स्वर बोझिल हैं और शब्द साथ नहीं दे रहे। प्रयाग में जो घटित हुआ, उसने मन को गहरी पीड़ा दी है। बिना स्नान किए यहां से लौटना पड़ रहा है, यह अत्यंत दुखद है।” शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि बुधवार सुबह प्रशासन की ओर से एक प्रस्ताव उनके पास भेजा गया था। प्रस्ताव में कहा गया था कि जब भी वे स्नान के लिए चाहें, उन्हें ससम्मान पालकी के साथ संगम ले जाया जाएगा, अधिकारी स्वयं स्वागत करेंगे और पुष्प वर्षा भी की जाएगी।

बीते 10 दिनों से धरने पर बैठे थे शंकराचार्य

हालांकि, शंकराचार्य ने इस प्रस्ताव को साफ तौर पर अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि प्रस्ताव में क्षमा याचना का कोई उल्लेख नहीं है, जबकि असल मुद्दा यही है। उन्होंने कहा, “संतों, सन्यासियों और बटुकों के साथ जिस तरह का व्यवहार हुआ, उसके लिए प्रशासन को सार्वजनिक रूप से क्षमा मांगनी चाहिए। यदि गलती स्वीकार कर माफी नहीं मांगी जाती, तो कोई भी अन्य प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं है।” शंकराचार्य के अनुसार, वे लगभग दस दिनों तक अपने शिविर के बाहर बैठे रहे और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराते रहे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब उन्होंने प्रयाग छोड़ने का निर्णय कर लिया, तभी प्रशासन की ओर से प्रस्ताव भेजा गया। “अब इस प्रस्ताव का कोई अर्थ नहीं रह जाता। आत्मसम्मान से समझौता करके स्नान करना मेरे लिए संभव नहीं है

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