जमीन उपयोग और टाउन-प्लानिंग विवादों पर NGT का अधिकार नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई सीमा

डिजिटल डेस्क- सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे विवाद, जिनका मूल मुद्दा जमीन के इस्तेमाल, जोनिंग नियमों, बिल्डिंग प्लान की मंजूरी और टाउन-प्लानिंग कानूनों के पालन से जुड़ा हो, उन पर NGT फैसला नहीं सुना सकता, भले ही उन्हें पर्यावरण से जुड़ी चिंता के रूप में पेश किया गया हो। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि ओपन और ग्रीन स्पेस के लिए बिल्डिंग प्लान का पालन न करने से जुड़ा विवाद अपने आप में कोई “पर्यावरण से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न” नहीं बन जाता, जिससे NGT को अधिकार मिल जाए। कोर्ट के मुताबिक, ऐसे मामलों में NGT द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र का विस्तार करना कानून के दायरे से बाहर है।

गुरुग्राम की एंबियंस लैगून द्वीप परियोजना से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की टिप्पणी

यह टिप्पणी गुरुग्राम की एंबियंस लैगून द्वीप परियोजना से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई। इस मामले में आरोप था कि एंबियंस डेवलपर्स ने जिस जमीन पर आवासीय उपयोग के लिए लाइसेंस लिया था, वहां वाणिज्यिक निर्माण किया गया। शिकायतकर्ताओं ने इसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला बताते हुए NGT का दरवाजा खटखटाया था। इन दावों पर कार्रवाई करते हुए NGT ने पहले अंतरिम आदेश पारित किए थे। इसमें 10.33 करोड़ रुपये का एनवायरनमेंटल कंपनसेशन लगाने, मुनाफे का 25 से 50 प्रतिशत तक रोकने और कथित उल्लंघनों की जांच के लिए विशेषज्ञ समितियों के गठन जैसे निर्देश शामिल थे। एक समिति ने तो भारी जुर्माने के साथ-साथ कुछ व्यावसायिक संरचनाओं को गिराने की सिफारिश भी की थी।

NGT का अधिकार क्षेत्र केवल NGT अधिनियम, 2010 की अनुसूची-1 के विषयों तक सीमित- सुप्रीम कोर्ट

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले को अलग नजरिए से देखा। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा विवाद का मुख्य मुद्दा पर्यावरणीय नुकसान नहीं, बल्कि डी-लाइसेंसिंग की कानूनी वैधता और टाउन-प्लानिंग कानूनों के तहत जमीन के कमर्शियल इस्तेमाल की अनुमति से जुड़ा है। ऐसे सवाल पहले से ही पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में लंबित हैं। इसलिए, समानांतर रूप से NGT का हस्तक्षेप करना उसके अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण माना जाएगा। न्यायमूर्ति संदीप मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में ऑरोविले फाउंडेशन बनाम नवरोज केरसप मोदी एवं अन्य, 2025 लाइवलॉ (एससी) 312 का हवाला देते हुए कहा गया कि NGT का अधिकार क्षेत्र केवल NGT अधिनियम, 2010 की अनुसूची-1 में उल्लिखित विशेष पर्यावरण कानूनों से उत्पन्न होने वाले “पर्यावरण से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नों” तक ही सीमित है।

NGT के समक्ष चल रही कार्यवाही पर लगाई रोक

अदालत ने आदेश दिया कि जब तक पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में लंबित मामलों का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक NGT के समक्ष चल रही कार्यवाही पर रोक रहेगी। इसका मतलब यह है कि फिलहाल 10.33 करोड़ रुपये के एनवायरनमेंटल कंपनसेशन, मुनाफे का हिस्सा रोके जाने और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स को गिराने जैसी सख्त कार्रवाइयों पर कोई अमल नहीं होगा। इस फैसले को जमीन से जुड़े विवादों में NGT की भूमिका को सीमित करने और अधिकार क्षेत्र की स्पष्टता तय करने के लिहाज से एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

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