डिजिटल डेस्क- सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लेकर एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि केवल किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को अपशब्द कहना अपने आप में SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। इस कानून को लागू करने के लिए कुछ विशेष शर्तों का पूरा होना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि जब तक अपशब्दों में जातिगत नाम का प्रयोग न किया गया हो और वह भी सार्वजनिक स्थान पर न कहा गया हो, तब तक अधिनियम की धाराएं स्वतः लागू नहीं होंगी। अदालत ने कहा कि आरोपों से यह स्पष्ट होना चाहिए कि अपशब्द कहने के दौरान जाति का नाम अपमानजनक रूप में लिया गया था, या जाति के आधार पर जानबूझकर अपमान किया गया था।
जानबूझकर किया गया अपमान माना जाएगा अपराध- सुप्रीम कोर्ट
पीठ ने कहा कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(s) में अपमान का तत्व अंतर्निहित है। यानी, केवल सामान्य गाली-गलौज नहीं, बल्कि जाति के प्रति जानबूझकर किया गया अपमान ही इस धारा के अंतर्गत अपराध माना जाएगा। यदि अपशब्दों का उद्देश्य जातिगत अपमान पैदा करना है, तभी कानून की यह धारा लागू होगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपशब्द कहने के पीछे का इरादा (Intent) बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत के अनुसार, अगर शब्दों का प्रयोग इस उद्देश्य से किया गया हो कि पीड़ित व्यक्ति की जाति को नीचा दिखाया जाए और उससे जातिगत अपमान की भावना उत्पन्न हो, तभी उसे अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है।
पूर्व के फैसलों का दिया हवाला
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम की धारा 3(1)(r) से जुड़े अपने पूर्व के फैसलों का भी हवाला दिया। अदालत ने दोहराया कि किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य का जानबूझकर अपमान करना या उसे डराने-धमकाने का कृत्य, यदि सार्वजनिक स्थान पर किया गया हो, तभी वह अपराध बनता है। पीठ ने SC/ST एक्ट के तहत अपराध सिद्ध होने के लिए चार मूलभूत तत्वों को स्पष्ट रूप से गिनाया।
अपराध सिद्ध होने के लिए चार तत्व होने जरूरी
पहला, आरोपी व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं होना चाहिए। दूसरा, आरोपी ने जानबूझकर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य का अपमान किया हो या उसे डराया-धमकाया हो। तीसरा, यह कृत्य उस व्यक्ति को अपमानित करने के इरादे से किया गया हो। चौथा, यह पूरा कृत्य सार्वजनिक स्थान पर हुआ हो, जहां अन्य लोग मौजूद हों या देख-सुन सकें। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन चारों तत्वों की अनुपस्थिति में SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता। अदालत की यह टिप्पणी कानून के दुरुपयोग को रोकने और वास्तविक पीड़ितों को न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।