डिजिटल डेस्क- मुंबई में आयोजित ‘विहार सेवक ऊर्जा मिलन’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने धर्म, समाज और राष्ट्र की भूमिका को लेकर बड़ा वैचारिक बयान दिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड को चलाने वाली शक्ति है। अगर समाज धर्म द्वारा संचालित ‘गाड़ी’ में बैठेगा, तो उसका कभी ‘एक्सीडेंट’ नहीं होगा। मोहन भागवत ने कहा कि कोई राज्य भले ही सेक्युलर हो सकता है, लेकिन कोई भी जीवित या निर्जीव वस्तु धर्म के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पानी का भी अपना धर्म होता है—बहना। उसी तरह मानव जीवन और समाज का भी अपना धर्म है, जो उसे सही दिशा देता है।
भारत के पास यह ज्ञान सदियों से मौजूद- मोहन भागवत
RSS प्रमुख ने कहा कि जब तक भारतवर्ष धर्म से निर्देशित रहेगा, तब तक वह विश्वगुरु बना रहेगा। उन्होंने कहा कि आज दुनिया आध्यात्मिक ज्ञान की कमी से जूझ रही है और भारत के पास यह ज्ञान सदियों से मौजूद है। यही वजह है कि भारत की भूमिका केवल एक देश की नहीं, बल्कि मार्गदर्शक की है। संतों की भूमिका पर बात करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि संत समाज की गरिमा और सम्मान बनाए रखना हम सभी का कर्तव्य है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री स्वयं कहते हैं कि संतों को ‘ना’ कहने में उन्हें हिचकिचाहट होती है। यह हमारी संस्कृति की विशेषता है।
हम भगवान का काम कर रहे हैं, लेकिन हम भगवान नहीं हैं- मोहन भागवत
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने यह भी कहा कि हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि हम भगवान का काम कर रहे हैं, लेकिन हम भगवान नहीं हैं। अहंकार से बचते हुए सेवा भाव के साथ काम करना ही सच्चा धर्म है। जाति व्यवस्था के मुद्दे पर उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए इसे पहले मन से निकालना होगा। अगर समाज ईमानदारी से प्रयास करे, तो 10 से 12 वर्षों में जाति आधारित भेदभाव समाप्त हो सकता है। संघ के उद्देश्य पर बोलते हुए RSS प्रमुख ने कहा कि संघ किसी प्रतिक्रिया से बना संगठन नहीं है और न ही वह किसी से प्रतिस्पर्धा करता है। संघ व्यक्ति के चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण करता है। उसका लक्ष्य खुद बड़ा बनना नहीं, बल्कि समाज को बड़ा बनाना है।