जोशीमठ को बचाने के लिए सरकार का एक्शन, जर्जर मकानों को जाएगा गिराया

के-न्यूज/उत्तराखंड-

उत्तराखंड के जोशीमठ में 678 से ज्यादा घरों में दरारें आईं हैं और यह संकट गहराता जा रहा है, लेकिन ये संकट आज का नहीं है. 1976 में 18 सदस्यीय समिति ने चेतावनी दी थी कि जोशीमठ शहर भौगोलिक रूप से अस्थिर है. इसके साथ ही समिति ने कई प्रतिबंधों के साथ सुझाव भी दिया था, लेकिन तब से अब तक सरकारें सोई रहीं. जिसका नतीजा हुआ कि जोशीमठ जैसा ऐतिहासिक शहर पाताल में समा रहा है.

जोशीमठ के मकानों पर रेड क्रॉस

जोशीमठ के सिंधी गांधीनगर और मनोहर बाग एरिया डेंजर जोन में हैं। यहां के मकानों पर रेड क्रॉस लगाए गए हैं। प्रशासन ने इन मकानों को रहने लायक नहीं बताया है। चमोली DM हिमांशु खुराना ने बताया कि जोशीमठ और आसपास के इलाकों में कंस्ट्रक्शन बैन कर दिया गया है।यहां 603 घरों में दरारें आई हैं। ज्यादातर लोग डर के चलते घर के बाहर ही रह रहे हैं। किराएदार भी लैंड स्लाइड के डर से घर छोड़कर चले गए हैं। अभी तक 70 परिवारों को वहां से हटाया गया है। बाकियों को हटाने का काम चल रहा है। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे रिलीफ कैंप में चले जाएं।

तपोवन टनल कर रही है नुकसान?

जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति से जुड़े वैज्ञानिक इसे एनटीपीसी की 520 मेगावाट तपोवन-विष्णुगाद परियोजना के कारण हुआ धंसाव बताते हैं. इस परियोजना की टनल जोशीमठ के नीचे से होकर बन रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस टनल के कारण भू जल स्रोत छेड़े गए हैं, जिससे पानी का अंदरूनी रिसाव होने लगा है और यही कारण है कि पहाड़ बैठ रहा है. अगर आप जोशीमठ की भौगोलिक स्थिति देखें तो समझ आएगा यह पूरा इलाका पहाड़ पर बसा हुआ है.

जो इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं वे नदी के पास हैं. इसी इलाके में अलकनंदा और धौलीगंगा का संगम है. यहीं से ये नदियां बद्रीनाथ की तरफ मुड़ती हैं. पिछले साल आई बाढ़ को लेकर भी लोगों को शक है कि उसकी वजह से भी इस तरह की घटनाएं हो सकती हैं. वहीं, IIT रुड़की के वैज्ञानिकों का मानना है कि जोशीमठ में कोई सीवर सिस्टम नहीं है, सारा का सारा पानी पहाड़ में जाता है. इस वजह से भी पहाड़ बैठ सकता है.

वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और IIT रुड़की के वैज्ञानिकों का मानना है कि दोनों नदियों (अलकनंदा और धौलीगंगा) की तेज धार जोशीमठ के नीचे पहाड़ी में कटाव कर रही हैं. यह कटाव इसलिए भी आसानी से हो रहा है, क्योंकि जोशीमठ का पहाड़ मजबूत ना होकर ग्लेशियर मोरन (पहले कभी ग्लेशियर रहा, फिर बर्फ खत्म होने के कारण बची मिट्टी-कंकड़ का ढेर) है.