पितृपक्ष का महत्व

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा सबसे बड़ी पूजा मानी जाती है। माता-पिता के जीवित रहते हुए और उनकी मृत्यु के बाद भी उन्हें याद किया जाता है. जन्मदाता को उनके पुत्र भुला न दें, इसके लिए ही हिन्दू धर्मग्रंथों में श्राद्ध करने की परंपरा है। पितृपक्ष में पूर्वजों को याद करके दान धर्म करने की परंपरा है।  हिन्दू धर्म में इन दिनों का खास महत्व है। यूं तो साल के किसी भी महीने में या जिस महीने माता-पिता की मृत्यु हुई होती है, उस महीने में श्राद्ध किया जाता है। लेकिन पितृपक्ष (Pitr Paksha) में यदि श्राद्ध किया जाए, तो उसकी मान्यता सबसे अधिक है। धर्मग्रंथों में माता-पिता के साथ-साथ अन्य पूर्वजों का श्राद्ध करने की परंपरा है।

कब होता है श्राद्ध

सभी पूर्वजों का श्राद्ध एक साथ कर सकें, इसके लिए जो समय निर्धारित है, उसे ही पितृपक्ष कहते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ नाराज हो जाएं तो घर की तरक्की में बाधाएं उत्पन्न होने लगती हैं। भादो या भाद्रपद महीने की अमावस्या शुरू होते ही अगले 15 दिनों तक के समय को पितृपक्ष कहा जाता है। मान्यता है कि पितृपक्ष के 15 दिनों में पिंडदान करने से आपके पूर्वजों की आत्मा तृप्त होती है।

क्या क्या करते है

इन दिनों में आप दूध, चावल, शहद आदि मिलाकर जो पिंड बनाते हैं और उसे कौवे या गाय को खिलाकर पितरों को खिलाने का पुण्य कार्य करते हैं, इससे आपके अपनों (जिनकी मृत्यु हो चुकी है) की आत्मा को संतुष्टि मिलती है।

इस वर्ष पितृ पूजन 20 सितंबर से शुरू होकर 06 अक्टूबर को समाप्त हो जाएगा।